Saturday, December 30, 2006

मंगलकामना

नया साल सबके लिए खुशहाली लेकर आए। सर्वत्र सुख-शांति हो।
कुछ शब्द प्रस्तुत हैं-

प्यार हो, प्यार हो ,
बस प्यार हो,
हर किसी में अपार हो।
ना रहे कोई वँचित,
ना रखे कोई सँचित,
यह तो खर्च हर बार हो।
प्यार हो प्यार हो,
बस प्यार हो।

धनी तो प्यार के सभी होंगे,
शायद ही ग़रीबी की रेखा के नीचे होंगे,
खर्च पर समान हो,
प्यार हो, प्यार हो,
बस प्यार हो।

धर्म आड़े ना आएँ,
संप्रदाय बाड़े ना लगाएँ,
ना हों वैमनस्य की मेढ़ें बनीं,
ना हों ईर्ष्या-जलन की दीवारें खड़ीं,
बस सरल मैदान हो,
प्यार हो, प्यार हो,
बस प्यार हो।

ना भय किसी में हो,
ना भय किसी से हो,
बस निश्छल मन हो,
भरा गुणों से जन हो,
सभी में ये भाव हो,
प्यार हो, प्यार हो,
बस प्यार हो।

हो एक ही धर्म मानवता,
सबका एक ही कर्म पालन का।
सभी में हो रसिकता,
जो बने सभी की मोहकता,
अपनत्व की बौछार हो,
प्यार हो, प्यार हो,
बस प्यार हो।

Friday, December 29, 2006

नया साल आने वाला ही है

निवेदन!
साल के अंत में हम सभी कुछ ना कुछ लेखाजोखा तो अवश्य करते हैं, सोचते हैं क्या अच्छा रहा क्या बुरा घटित हुआ? क्या उप्लब्ध हुआ क्या ना मिलने का अफ़सोस रहा? क्या चाहा था! क्या हो गया! अच्छी बातों के लिए हम अपनी तारीफ़ करने लगते हैं तो ना पसंद बातों के कारणों का ठीकरा किसी और के सिर फोड़ देते हैं या फिर क़िस्मत और भगवान के हिस्से कर देते है।
तकनीकी क्रांति और उपभोक्तावाद की चकाचौंध में हमारी आँखें पूरी नहीं खुल पा रहीं हैं। नए साल के पहले लेखाजोखा करते समय सभी को रौशनी की ओर पीठ करके देखना चाहिए।
सामाजिक बुराइयाँ सभी के लिए परेशानी का कारण हैं, यदि शिक्षित और समृद्ध समाज थोड़ा समय इनके उन्मूलन के प्रयोजन में लगाए तो अवश्य ही बदलाव आएगा। सामाजिक बुराइयाँ क़ानून के साथ-साथ समाज के सहयोग से ही दूर की जा सकती हैं। हम सब का कर्त्तव्य है कि अपनी-अपनी क्षमता और सामर्थ के अनुसार समाज सुधार के लिए समय दान करें।
नयी पीढ़ी(बहुसंख्यक है) के गुमराहों पर संकेतक लगाएं तथा उन्हें रास्ते चुनने में निःस्वार्थ मदद करें।
संवाद एक सर्वाधिक प्रभावशाली तरीक़ा है। उनके बीच अल्प समय बिताकर भी उनमें उत्साह और आशा का संचार किया जा सकता है। शुद्ध परामर्श और निर्देशन उनका जीवन बदल सकते हैं, परंतु इसके लिए पहले स्वयं व्रत लेना होगा, इसका परिणाम सभी के लिए सुखदायी होगा। विचारों और व्यवहार में समृद्ध समाज स्वर्ग से भी बढ़कर होता है।

Sunday, December 24, 2006

मानवता सर्वोपरि

भारत एक सहिष्णु राष्ट्र है और धर्मनिरपेक्षता का अनुयायी है। क्रिसमस के अवसर पर सभी को शुभकामनाएँ। ईशु ने प्रेम का संदेश दिया और सेवा को कर्त्तव्य बताया यही तो श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है , यही मौहम्म्द साहब ने सिखाया और यही गौतम बुद्ध और श्री महावीर स्वामी ने कहा है। सभी के विचार समान हैं। हम सभी परस्पर स्नेह और सेवा के धर्म में बंधे हैं अर्थात मानवता सर्वोपरि है।

Saturday, December 16, 2006

सरद-काल

सरद-काल


सरद काल
गुड़ मिला भात
मक्की की रोटी
सरसों का साग
वाह! भई क्या बात।

सरद काल
ख़िला ग़ुलाब
गेंदा आबाद
क़ुदरत तेरा कमाल।

सरद काल
ब्याह की ढ़पताल
पंडितों की मालामाल
घोड़ी बेहाल।

सरद काल
रजाई गद्दा का सवाल
ग़रीब के जी का जंजाल।

सरद काल
धूप का अकाल
बिजली की किल्लत
जीवन बेहाल।

सरद काल
क्रिकेट का बुख़ार
टीवी के आगे बैठने को लाचार।

(कम्प्यूटर ख़राब था इसलिए इतने दिनों बाद )

Sunday, October 22, 2006

परंपरा

हमारे ग्रामों और क़स्बों में आज भी लक्ष्मी-पूजन भित्ती-चित्र के साथ होता है। महिलाएँ चावल को दूध में पीसकर उससे दीवार का एक चौकोर हिस्सा पोतकर उस पर गेरु से यह बनाती हैं और लक्ष्मी-दरबार सजातीं हैं। यहीं रात्रि में पूजन होता है।
गोवर्धन महाराज (श्रीकृष्ण) आँगन में गाय के गोबर से बनाकर पूजे जाते हैं। गवाले को भी उपहार या मिष्ठान इत्यादि मिलते हैं।

Thursday, October 19, 2006

शुभ दीपावली

दीप जले हैं,
चहुँ ओर सजे हैं।
ज्योतिर्मय है धरा और पवन,
ज्योति के जैसे खिले सुमन।
घर आलोकित, दर आलोकित,
आलोकित है पथ सारा,
धरती के इन दीपों ने
कर दिया है धुंधला तारा मंडल सारा।
सर्वत्र प्रकाश ही प्रकाश है,
अंधकार को ना कोई आस है,
सो वह धुंआ बन उड़ रहा है,
प्रकाश से डर रहा है।
आओ हम मन का प्रकाश करें,
तन में प्रकाशित श्वांस भरें।
दिव्य भाव ज्योति जलाएँ,
कटुभाव तिमिर मिटाएँ।
संदेह को ज़ुदा कर दें,
त्याग और विश्वास के दिये धर दें।
प्यार की रौशनी से,
मानवता का पथ सजे,
सत्य-अहिंसा के रथ पर चढ़कर,
एक साथ सब चलें।
संपूर्ण संसार को प्रकाशित करें,
संपूर्ण ब्रह्मांड को आलोकित करें।

Wednesday, October 18, 2006

शुभकामनाएँ

स्वीकार हों दीपावली की शुभकामनाएँ,
हैं छिपी इसमें सदभावनाएँ।
गणपति विघ्न मिटाएँ,
मान-बुद्धिधन सदा लुटाएँ।
सरस्वती ज्ञान का भंडार दें,
राशि बढ़े ऐसा वरदान दें।
लक्ष्मी करें धन की कृपा,
दें सभी की दरिद्रता मिटा।
प्यार का दीप जलता रहे,
नफरत का धुंआ छटता रहे।
सदा मन मे दीवाली रहे,
पृथ्वी हरी-संपदा वाली रहे॥

Tuesday, October 10, 2006

श्लेषाधिराज

हिंदी-साहित्य के इतिहास में ऐसे अनेक कवि हुए हैं जिनके कृतित्त्व तो प्राप्त हैं, परंतु व्यक्तित्त्व के विषय में कुछ भी ठीक से पता नहीं है। भक्तिकाल की समाप्ति और रीतिकाल के प्रारंभ के संधिकाल मे भी एक महाकवि हुए हैं जिनके जीवन के विषय में जानकारी के नाम पर मात्र उनका लिखा एक कवित्त ही है, ऐसे श्लेषाधिराज महाकवि 'सेनापति' के विषय में लिखना आज 'मन की बात' है।
"दीक्षित परसराम, दादौ है विदित नाम,
जिन कीने यज्ञ, जाकी जग में बढ़ाई है।
गंगाधर पिता, गंगाधार ही समान जाकौ,
गंगातीर बसति अनूप जिन पाई है।
महाजानि मनि, विद्यादान हूँ कौ चिंतामनि,
हीरामनि दीक्षित पै तैं पाई पंडिताई है।
सेनापति सोई, सीतापति के प्रसाद जाकी,
सब कवि कान दै सुनत कविताई हैं॥"

यही कवित्त सेनापति के जीवन परिचय का आधार है। इसके आधार पर विद्वानों ने सेनापति के पितामह का नाम परसराम दीक्षित और पिता का नाम गंगाधर माना हैं। 'गंगातीर बसति अनूप जिन पाई है' के आधार पर उन्हें उत्तर-प्रदेश के गंगा-किनारे बसे अनूपशहर क़स्बे का माना है। सेनापति पर शोध कर चुके डॉ. चंद्रपाल शर्मा ने भी सेनापति के निवास के विषय में ऐसा ही लिखा है: "अनूपशहर-निवासी ९० वर्षीय वयोवृद्ध पंडित मंगलसेनजी ने हमें सन १९७० में बताया था कि उन्होंने अपने पिता से बचपन में यही सुना था कि सेनापति के पिता अनूपशहर में लकड़ी के मुनीम बनकर आए थे।………..अनूपशहर की 'हिंदी साहित्य परिषद' ने जिस स्थान पर 'सेनापति-स्मारक बनवाया है वह स्थान भी मंगलसेनजी ने अपने पिता से सेनापति के मकान के रुप में ही सुना था।"
सेनापति के विषय में कोई पुष्ट प्रमाण नहीं हैं फिर भी अनूपशहर में सम्मानस्वरुप सेनापति-स्मारक बनाया हुआ है और श्रद्धांजलि स्वरुप हर साल शरद-पूर्णिमा को कवि-सम्मेलन का आयोजन किया जाता रहा है। उस मंच से राष्ट्र-कवि सोहनलाल द्विवेदी जैसी महानविभूतियाँ कविता पाठ करके महाकवि सेनापति को अपने श्रद्धा-सुमन अर्पित कर चुकी हैं।
सेनापति के विषय में विद्वानों ने माना है कि उन्होंने 'काव्य-कल्पद्रुम' और 'कवित्त-रत्नाकर' नामक दो ग्रंथों की रचना की थी। 'काव्यकल्पद्रुम' का कुछ पता नहीं है। 'कवित्तरत्नाकर' उनकी एक मात्र प्राप्त कृति है। इस विषय में डॉ. चंद्रपाल शर्मा ने कहीं लिखा है-"सन १९२४ में जब प्रयाग विश्वविद्यालय में हिंदी का अध्ययन अध्यापन प्रारंभ हुआ, तब कविवर सेनापति के एकमात्र उपलब्ध ग्रंथ 'कवित्त-रत्नाकर' को एम.ए. के पाठ्यक्रम में स्थान मिला था। उस समय इस ग्रंथ की कोई प्रकाशित प्रति उपलब्ध नहीं थी। अतः केवल कुछ हस्तलिखित पोथियाँ एकत्रित करके पढ़ाई प्रारंभ की थी। सन १९३५ में प्रयाग विश्वविद्यालय के रिसर्चस्कॉलर पं.उमाशंकर शुक्ल ने एक वर्ष के कठोर परिश्रम के बाद इस ग्रंथ की विविध हस्तलिखित प्रतियों को सामने रखकर एक मान्य प्रति तैयार की थी, जो प्रयाग-विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग ने प्रकाशित करायी थी। '
कवि की निम्नलिखित पंक्तियों के आधार पर 'कवित्त-रत्नाकर' के विषय में माना जाता रहा है कि उन्होंने इसे सत्रहवीं शताब्दी के उतरार्ध में रचा होगा-
"संवत सत्रह सै मैं सेई सियापति पांय,
सेनापति कविता सजी, सज्जन सजौ सहाई।"
अपनी कविताई के विषय में कवि ने लिखा है-
"राखति न दोषै पोषे पिंगल के लच्छन कौं,
बुध कवि के जो उपकंठ ही बसति है।
जोय पद मन कौं हरष उपजावति, है,
तजै को कनरसै जो छंद सरस्ति हैं।
अच्छर हैं बिसद करति उषै आप सम,
जातएं जगत की जड़ताऊ बिनसति है।
मानौं छबि ताकी उदबत सबिता की सेना-
पति कबि ताकि कबिताई बिलसति हैं॥"

अन्य देखें-
"तुकन सहित भले फल कौं धरत सूधे,
दूरि कौं चलत जे हैं धीर जिय ज्यारी के।
लागत बिबिध पच्छ सोहत है गुन संग,
स्रवन मिलत मूल कीरति उज्यारी के।
सोई सीस धुनै जाके उर मैं चुभत नीके'
बेग बिधि जात मन मोहैं नरनारी के।
सेनापति कबि के कबित्त बिलसत अति,
मेरे जानबान हैं अचूक चापधारी के।"
कवि को अपनी रचना चोरी हो जाने का भय भी था, तभी तो उन्होंने लिखा है-
"बानी सौ सहित, सुबरन मुँह रहैं जहाँ,
धरति बहु भांति अरथ समाज कौ।
संख्या कर लिजै, अलंकार हैं अधिक यामैं,
रखौ मति ऊपर सरस ऐसे साज कौं।
सुनै महाराज चोरि होत चारचरन की ,
तातैं सेनापति कहैं तजि करि ब्याज कौं।
लीजियौं बचाइ ज्यौं चुराबै नाहिं कोई सौपी,
बित्त की सी थाति है, कबित्तन की राज कौं।"
कवित्त, छ्प्पय और कुंडली छंदों में रचित 'कवित्त-रत्नाकर' पाँच तरंगों में विभक्त है। अध्यायों को तरंग कहा गया है।
प्रथम तरंग- श्लेष-वर्णन है, जिसमें ९६ पद हैं जिनमें श्लेष-योजना आजतक अतुलनीय और अनुपमेय है। कवि ने स्वयं लिखा है-
"मूढ़न कौ अगम, सुगम एक ताकौ, जाकी,
तीछन अमल बिधि बुद्धि है अथाह की।
कोई है अभंग, कोई पद है सभंग, सोधि,
देखे सब अंग, सम सुधा के प्रवाह की।
ज्ञान के निधान , छंद-कोष सावधान जाकी,
रसिक सुजान सब करत हैं गाहकी।
सेवक सियापति कौ, सेनापति कवि सोई,
जाकी द्वै अरथ कबिताई निरवाह की॥"
दूसरी तरंग में ७४ कवित्त में श्रंगार वर्णन है। यहाँ कवि ने अपने पूर्वज कवियों की परंपरा को निभाया है।-
(१) "लीने सुघराई संग सोहत ललित अंग,
सुरत के काम के सुघर ही बसति है।
गोरी नव रस रामकरी है सरस सोहै,
सूहे के परस कलियान सरसति है।
सेनापति जाके बाँके रुप उरझत मन,
बीना मैं मधुर नाद सुधा बरसति है।
गूजरी झनक-झनक माँझ सुभग तनक हम,
देखी एक बाला राग माला सी लसति है॥"

(२) "कौल की है पूरी जाकी दिन-दिन बाढ़ै छवि,
रंचक सरस नथ झलकति लोल है।
रहैं परि यारी करि संगर मैं दामिनी सी,
धीरज निदान जाहि बिछुरत को लहै।
यह नव नारि सांचि काम की सी तलबारि है,
अचरज एक मन आवत अतोल है।
सेनापति बाहैं जब धारे तब बार-बार,
ज्यौं-ज्यौं मुरिजात स्यौं, त्यौं अमोल हैं॥"
तृतीय तरंग में ६२ कवित्तों में षडऋतु-वर्णन है। कुछ बानगी देखें-
(१)"तीर तैं अधिक बारिधार निरधार महा,
दारुन मकर चैन होत है नदीन कौ।
होति है करक अति बदि न सिराति राति,
तिल-तिल बाढ़ै पीर पूरी बिरहिन कौं।
सीरक अधिक चारों ओर अबनई रहै ना,
पाऊँरीन बिना क्यौं हूँ बनत धनीन कौं।
सेनापति बरनी है बरषा सिसिरा रितु,
मूढ़न कौ अगम-सुगम परबीन कौं।
(२) "धरयौ है रसाल मोर सरस सिरच रुचि,
उँचे सब कुल मिले गलत न अंत है।
सुचि है अवनि बारि भयौ लाज होम तहाँ,
भौंरे देखि होत अलि आनंद अनंत है।
नीकी अगवानी होत सुख जन वासों सब,
सजी तेल ताई चैंन मैंन भयंत है।
सेनापति धुनि द्विज साखा उच्चतर देखौ,
बनौ दुलहिन बनी दुलह बसंत है।"
चतुर्थ तरंग में ७६ कवित्त हैं जिनमें रामकथा मुक्त रुप में लिखी है।-
"कुस लव रस करि गाई सुर धुनि कहि,
भाई मन संतन के त्रिभुवन जानि है।
देबन उपाइ कीनौ यहै भौ उतारन कौं,
बिसद बरन जाकी सुधार सम बानी है।
भुवपति रुप देह धारी पुत्र सील हरि
आई सुरपुर तैं धरनि सियारानि है।
तीरथ सरब सिरोमनि सेनापति जानि,
राम की कहनी गंगाधार सी बखानी है।"
पाँचवी तरंग में ८६ कवित्त हैं, जिनमें राम-रसायन वर्णन है। इनमें राम, कृष्ण, शिव और गंगा की महिमा का गान है। 'गंगा-महिमा' दृष्टव्य है-
"पावन अधिक सब तीरथ तैं जाकी धार,
जहाँ मरि पापी होत सुरपुरपति है।
देखत ही जाकौ भलौ घाट पहिचानियत,
एक रुप बानी जाके पानी की रहति है।
बड़ी रज राखै जाकौ महा धीर तरसत,
सेनापति ठौर-ठौर नीकी यैं बहति है।
पाप पतवारि के कतल करिबै कौं गंगा,
पुन्य की असील तरवारि सी लसति है।"
सेनापति ने अपने काव्य में सभी रसों को अपनाया है। ब्रज भाषा में लिखे पदों में फारसी और संस्कृत के शब्दों का भी प्रयोग किया है। अलंकारों की बात करें तो सेनापति को श्लेष से तो मोह था। अपने काव्य पर भी कवि को गर्व था-
"दोष सौ मलीन, गुन-हीन कविता है, तो पै,
कीने अरबीन परबीन कोई सुनि है।
बिन ही सिखाए, सब सीखि है सुमति जौ पै,
सरस अनूप रस रुप यामैं हुनि है।
दूसन कौ करिकै कवित्त बिन बःऊषन कौ,
जो करै प्रसिद्ध ऐसो कौन सुर-मुनि है।
रामै अरचत सेनापति चरचत दोऊ,
कवित्त रचत यातैं पद चुनि-चुनि हैं।"
सेनापति ने तीनों गुणों प्रसाद, ओज और माधुर्य का निर्वाह किया है। माधुर्य का उदाहरण पठनीय है-
"तोरयो है पिनाक, नाक-पल बरसत फूल,
सेनापति किरति बखानै रामचंद्र की,
लैकै जयमाल सियबाल है बिलोकी छवि,
दशरथ लाल के बदन अरविंद की।
परी प्रेमफंद, उर बाढ़्यो है अनंद अति,
आछी मंद-मंद चाल,चलति गयंद की।
बरन कनक बनी बानक बनक आई,
झनक मनक बेटी जनक नरिंद्र की।"
शब्द-शक्ति के संदर्भ में देखा जाए तो कवि ने अमिधा को अच्छे से अपनाया है।
अंतः सेनापति विद्वान थे। काव्य-शिल्प में निष्णात थे, तभी तो 'मिश्र-बंधुओं' ने उन्हें नवरत्न के बाद का सर्वश्रेष्ठ कवि मना है। नीचे अनूपशहर स्थित 'सेनापति-स्मारक भवन' का चित्र है।

Tuesday, October 03, 2006

गांधीजी

महात्मा गांधी ने सत्याग्रह को सर्वाधिक प्रभावशाली औज़ार बताया था, परन्तु आज वास्तविकता कुछ और है। फिर भी दिलासा है, परिवर्तन की आशा है-

नहीं कोई शिकायत है दुनिया से,
वाक़िफ हूं उसकी पूरी हुलिया से।
यहां सच मरता है,
झूठ ही झूठ बिकता है।
ईमानदारी छली जाती है,
समझदारी पड़ी रह जाती है।
बेईमानी का चलन है,
परिश्रम पर जलन है।
यदि तुम चाहो करना तपस्या,
तो दिखायी देंगी असंख्य समस्या।
तुम मजबूर किए जाओगे,
सच से दूर फेंके जाओगे।
बार-बार मिलेगा धक्का,
झूठ के सहारे चलेगा खोटा सिक्का।
बार-बार उठेगी अंगुली,
ज़बरदस्ती भिड़ेगें दंगली।
पर तुम्हें तो अडिग रहना है,
सच के साथ अपनी बात कहना है।
मत बहकना जीवन की राह में,
कभी झूठ मत बोलना धन की चाह में।
वरना तुम्हारी आत्मा मर जाएगी,
सोचने की शक्ति चली जाएगी।
शेष रह जाएगी सांसारिक काया,
और साथ में छलने वाली माया।
सच की राह पर चले जाना,
झूठ को मिटाने की मन में लाना।
धीरे-धीरे परिवर्तन आएगा,
दुनिया को सच से सजाएगा,
सर्वत्र होगी ईमानदारी,
एकत्र होगी समझदारी।
एक दूसरे पर त्याग करना,
जीवन में स्नेह के रंग भरना।
आएगी बड़ी क्रांति,
सर्वत्र होगी शांति॥

Tuesday, September 26, 2006

शरद-ऋतु


वर्षा के जाते ही और शीत के आने से पहले शरद-ऋतु अपना प्रभाव दिखाती है। जहाँ वर्षा में हरियाली एक छत्र राज फैलाती है वहीं शीत में अनेक गहरे रंग खिल उठते हैं। बीच में शरद-ऋतु अपने श्वेत-धवल रंग से निसर्ग को चमकाती है। क्या चँद्रमा की चाँदनी! और क्या चाँदनी के पुष्प! सभी प्रकृति को सौम्यता प्रदान करते हैं।
वर्षा के जल से स्वच्छ हुआ पर्यावरण चाँदनी की निर्मलता को धरा पर ऐसे फैला देता है मानों दूधिया पारदर्शी चादर फैला दी हो।

ग्रीष्म में वायु कंजूस और कटूभाषी व्यक्ति जैसा रुप धारण कर लेती है तो शीत में वह ग़रीब के घर ज़बरन ठहरे मेहमान की तरह कष्टकारी प्रतीत होती है और शरद में वह शिशु के कोमल स्पर्श सी अनुभूति कराती है।

नदियाँ ग्रीष्म में महिला मजदूर की भाँति थकी सी लगती हैं तो वर्षा में प्रलय का स्वरुप लगतीं हैं पर शरद में फिरोज़ी परिधान पहने स्नेह छलकाती माँ के समान प्रतीत होती हैं।

शरद-ऋतु कोमलता और सुन्दरता अर्थात माधुर्य-गुण की परिचायक है। प्रकृति की शांत और मोहक छवियाँ अन्तःस्थल की सूक्ष्मपरत तक प्रभावित करती हैं। कहते हैं शरद-चाँदनी में ही राधा-कृष्ण और ब्रज गोपियों ने महारास (जिसे भक्ति,प्रेम और सौन्दर्य की सर्वव्यापकता की अभिव्यक्ति माना गया है) किया था।

सच में शरद उल्लास का समय है। त्योहारों और उत्सवों की रौनक़ मन -हंस को भू-सरोवर में प्रकृति के सुंदर दृश्य रुपी मोती चुगवाती है।

Friday, September 15, 2006

नियम-संयम


नियम-संयम
चाहे कितनी दूर ले जाओ दृष्टि,
झाँककर देख लो पूरी सृष्टि।
कोई भी अलग नजर नहीं आएगा,
हरेक नियमों में बंधा पाएगा।
ब्रह्मांड घूम रहा है नियम से,
ना तेज भाग रहा है बिन संयम के।
सूर्य चमकता है ताप से,
चंद्रमा शांति देता है अपनेआप से।
धरती घूम-घूम कर घूमती है,
मानों किसी को ढूढती है।
वृक्ष खड़े हैं जड़ों के साथ,
नदियाँ बहती हैं लहरों के हाथ।
फूल खिलने का है अपना मौसम,
तारे चमकते हैं करके आसमां रौशन।
फिर तुम क्यों नियम तोड़ते हो,
सारी सृष्टि को इतना छेड़ते हो।
सब कुछ कर दिया है बेलगाम,
जैसे प्रकृति हो तुम्हारी ग़ुलाम।
पर तुम्हारा यह अहं ठीक नहीं,
नयों के लिए कोई सीख नहीं।
मत रखो नियमों को ताक पर,
मत काटो बैठे हो जिस शाख पर।
वरना स्वयं तो अंगभंग हो जाओगे,
साथ में औरों को भी विकलांग कर जाओगे।
यह ब्रह्मांड की रचना नियमों का ही फल है,
नियमों से छेड़छाड़ ही प्रलय का हल है।
जीओ और जीने दो संपूर्ण प्रकृति को,
अनुशान के साथ स्वर्ग बनने दो जगती को॥

Thursday, September 14, 2006

जय-भारती


माँ भारती
माँ का रुप है तू,
ध्वनि का स्वरुप है तू।
तेरे बिन हम अधूरे हैं,
तू ना हो तो बेसहूरे हैं।
तेरे से मिली है वाणी,

तेरे बिन दुनिया ना जानी।
माँ तू तो अभिमान है,
देश का सम्मान है।
तेरे से गुणगान है,
तेरे बिन सूना जहान है।
अपनी बहनों में तू रानी है,
वो तेरी अभिमानी हैं।
देशकाल से ऊपर है तू,
विषय-शैली का गौरव है तू।
अखिल विश्व में पहचान हमारी,
सबके दिलों की प्राणप्यारी।

कपूत उजाड़ पर तुले हैं,
तुझे मारने खड़े हैं।
पर उन्हें है क्या पता?
हम उन्हें देंगे जता!
नष्ट वो करेंगे अपने को,
तैयार हों सजा भुगतने को।
उनकी आवाज घुट जाएगी,
भारती सर्वत्र सुनी जाएगी।

समय अब दूर नहीं है,
हिंदी अब मजबूर नहीं है।

इसका मान बढ़ा है,
इसका सम्मान चढ़ा है।
राष्ट्रगौरव प्राप्त इसे,
राजवर मिला है इसे।
रानी है यह सरकार की,
नहीं परवाह इसे अधिकार की।
यह हृदय में रहती है,
गंगा जैसी बहती है।
इसकी तपस्या करनी है,
संपूर्ण जगत में भरनी है।

Tuesday, August 29, 2006

चाँदनी-रात


चाँदनी रात हरेक को प्रभावित करती है। योगी एकाग्रता की कोशिश करता है, जोगी प्रभु पाने की इच्छा! और मौजी मौज लेता है तो रोगी नींद। किसी को ये नैसर्गिक छटाएँ बहका देती हैं तो किसी को रुला देती हैं। किसी की वाह! निकलती है तो किसी की आह! कोई डरता है तो कोई मरता! किसी की रात कटती नहीं तो किसी की बढ़ती नहीं। हर रस और भाव में हमें रात बदली-बदली नज़र आती है।
रात रुपसि को रौनक़ लगे,
अंधकार साकारता को हरे।

सवेरे का प्रकाश बताएगा सच,
तू और मैं का मान कराएगा बस।

जो अन्तर है अंधेरे और प्रकाश में,
वही होता है भ्रम और विश्वास में।

सच तो ये है कि समय यूं रुका ही नहीं,
अगर रुक गया तो रहेगा कहीं का नहीं॥

Tuesday, August 22, 2006

दया-धर्म

दया धर्म की मूल है,
आज हो गयी फिजूल है,
दया तो दिखायी जाती है,
उसकी क़ीमत लगायी जाती है,
दया तो अपनों पर की जाती है,
दूसरों को तो दया की सीख दी जाती है।
*

धर्म एक रास्ता है,
जो सत्य-अहिंसा से साजता है,
पर आज यह बदल गया है,
इसका रुप बिगड़ गया है,
हो गया है बहुत सँकुचित,
बताता नहीं क्या है अनुचित,
कोई रास्ते की गंदगी साफ कर दो,
समभाव की टाइल्स बिछा दो।
***

Monday, August 21, 2006

प्रकृति की पुकार


यह तो हम सब को सुनकर अमल करना ही पड़ेगा वरना !!!
...परिणाम भी ना देख पाएँगे।

Wednesday, August 16, 2006

श्रीकृष्ण-दर्शन



श्रीकृष्ण-‘जीवन-दर्शन’

आज श्रीकृष्ण-जन्माष्टमी है। भगवान ने श्रीकृष्ण के रुप में द्वापर युग में अवतार लिया। सभी अवतारों में श्रीकृष्ण सर्वश्रेष्ठ सम्पूर्ण कलाओं से युक्त और सभी गुणों के प्रणेता एक व्यवहारिक महापुरुष हैं, जिंहोंने प्रेम को जीवन का आधार बताया, परंतु कर्त्तव्य के सम्मुख मन को नियँत्रित करने का उदाहरण प्रस्तुत किया। तभी तो श्यामाश्याम की जोड़ी बनाने वाले एवं अगाध प्रेम और श्रृंगाररस के महानायक ब्रज छोड़कर चले गये और ज्ञान की पराकाष्ठा के लिए कभी वापिस नहीं आए।
वास्तव में कृष्ण एक जीवन दर्शन है जो पग-पग पर हमें दृष्टिकोण प्रदान करने में सहायक है, बशर्ते हम उसे गहनता से समझ लें।
श्री कृष्ण के प्रादुर्भाव की कहानियों से लेकर उनके अंत तक की घटनाएँ हमें जीवन में सही रास्ता सुझाती हैं। आवश्यकता है तो बस इस बात की कि उसे संकीर्णता की चाशनी में ना डुबोया जाए बल्कि व्यापक दृष्टिकोण अपनाते हुए संप्रदाय से ऊपर जाकर जीवन-दर्शन (संपूर्ण सृष्टि का दर्शन) की इस अमूल्य निधि को खंगाला जाय।
ज्ञान, कर्म और योग का मिश्रण जीवन में आशा का संचार करता है, जीने की कला सिखाता है तथा जीवन सफल बनाता है। सैद्धांतिक रुप से हम सभी यह बातें जानते हैं, परंतु व्यवहार और प्रयोग में चंचल मन के कारण पंच-तत्त्वों (भौतिक) की स्थूलता से बाहर नहीं आ पाते हैं, जबकि भौतिक-सुख भी कृष्ण-दर्शन को समझ कर अनुभूत किए जा सकते हैं। बस समय बाँटकर एक बार अध्ययन और मनन की आवश्यकता है।
संसार में सभी जीव सुख से रहें- ऐसी मनोकामना के साथ ‘जय श्री कृष्ण’।

Monday, August 14, 2006

जय-हिंद



पंद्रह-अगस्त
आज का दिन तो है ऐसा पावन
जैसे गर्मी में झुलसे को मिला हो सावन।
आज की बात हो नहीं सकती है शब्दों में,
इस दिन छुड़ाया था माँ को फिरंगी के कब्जों से,
धोखे से अधिकार की उनकी चाल थी,
ज़्यादा हालत बेटों की बेहाल थी।
ना सूझता था कोई और काम,
बस रटा हुआ था हरेक को तेरा ही नाम।
रोज नयी बात सबके मन में आती थी,
आजादी की विधि सुझायी जाती थी।
हर कोई हो रहा था कुर्बान अपने-आप,
माँ के नाम पर उमड़ रहे थे भाव।
बूढ़े,बालक-जवां सभी तो समझते थे ख़ुद को सिपाही,
जान पर खेलकर वीरता औरतों ने थी दिखायी।
अँगरेजों की चाल कुछ काम ना आयी,
देश के सपूतों ने ऐसी धूल चटाई।
तेरी इज़्ज़त तो हमारी इज़्ज़त है,
तेरे आँगन में खेले हैं , बड़ी क़िस्मत है।
किसकी मजाल की देखे इस तरह से अब,
आँखें निकाल देंगे मिलकर सब।
तेरे कण- कण पर लगा देंगे अपनी जान है,
तेरे हित काम आना हमारी शान है।
खून की बूँद भी सिंचेगी तेरा गात,
तेरे बेटे हैं काम आएँगे दिल से आज।

Thursday, August 10, 2006

देश-प्रेम

देश प्रेम की बात करो मत,
देश प्रेम करके दिखलाओ।
देश-देश मेरा देश कहकर
यूँ हीं ना इतराओ।
करते हो प्यार देश से तो
देश-हित मरकर दिखलाओ।
देश-प्रेम बस!
ग़ुलामी से लड़ना ही नहीं था,
देश-प्रेम बस!
आजादी के गीत गाना ही नहीं था,
देश-प्रेम है तो
देश को बड़ा बनाओ,
देश में नवीनता लाओ,
देश के कण-कण को सजाओ,
देश के जन-जन को जगाओ,
देश में सच्ची देश-प्रेम की लहर फैलाओ,
तभी देश-प्रेम है,
तभी देश-प्रेम है।
भ्रष्टाचार देशद्रोह है,
अत्याचार देश विरोध है,
हिंसा और आतंक
देश के दुश्मन हैं,
स्त्री-अपमान
देश-प्रेम में अड़चन है।
देश-प्रेम की ज्वाला में जलकर ही
देश-प्रेम नहीं होता है!
देश-प्रेम की नदी में डूब उतरना भी
देश-प्रेम होता है।
ऐसे ही बस देश-देश ना दोहराओ,
देश-प्रेम है तो
देश हित जीवन लगाओ।
देश-प्रेम है तो देश की
नदियाँ ना गदलाओ,
पहाड़ ना गिराओ,
पेड़ ना मिटाओ,
देश की हवाएँ ना जलाओ
देश में जागरण करके दिखलाओ।
देश-द्रोही से जुड़ना देशद्रोह है,
देश-लुटेरों से मिलना देश-द्रोह है,
देश-प्रेमी से भिड़ना देशद्रोह है,
देश-धन से पलना देशद्रोह है।
रिश्वतखोरी, सीनाज़ोरी,
स्त्री की इज़्ज़त की चोरी,
कर्त्तव्यों से मोड़ामोड़ी,
अधिकारों की माला जोड़ी,
तो फिर देश-प्रेम की बात करो मत,
इस देश को अपना देश कहो मत।
करते हो प्यार देश से तो
देश की कलाओं को,
देश की ज़फाओं को,
देश की बफ़ाओं को
कभी ना ठहराओ,
तभी देश-प्रेम है,
तभी देश-प्रेम है,
तभी देश-प्रेम है॥

Tuesday, August 08, 2006

रक्षाबंधन




श्रावण-मास
शुक्ल-पक्ष पूर्णिमा
रक्षाबंधन।

बहिन-भाई
राखी रोली चावल
मुँह मिठाई।

राखियाँ सोहें
भ्राता-भगिनी मोहें
खुशियाँ जो हैं।

शुभ मनाएँ
राखी बांधें या भेजें
भाई चहकें।


यह त्योहार
बाल-वृद्ध जवान
खुश समान।


बंधन-देखें
राखी नेट पर हैं
मन से सोचें।

राखी


राखी


राखी


राखी


Saturday, August 05, 2006

यह तो भूमंडल की रानी है

यह भारत भूमि की कहानी है,
जिसकी मिसाल नहीं मिल पानी है।
हिमालय है मुकुट विशाल,
रखता है इसका उँचा भाल।
नदियाँ इसकी नाड़ी हैं,
जो सींचें फुलवाडी़ हैं।
मैदान इसके वक्षस्थल हैं,
जो पालन करते सबका हैं।
पठार मरुस्थल इसके हैं,
इसकी ममता को घेरे हैं।
सागर इसके दास हैं,
इसके चरणॊं के पास हैं।
रत्नों का भंडार यहाँ,
देखे सारा संसार जहां।
साक्ष्य भरे पड़े हैं
सब आप देख रहे हैं।
वेद इसकी वाणी हैं,
यहीं मानवता की जवानी है।
कर लो अनुसंधान कभी,
मानोगे इसे प्रधान सभी।
यह तो भूमंडल की रानी है,
जन-जन की कल्याणी है॥

Friday, August 04, 2006

साहस

तूफानों का साथ,
गहरी काली रात,
निर्भीक-शांत मन,
पहुँचने का प्रण,
यही है अभीष्ट अब,
मंजिल मिलेगी कब?

Monday, July 31, 2006

लोकनायक तुलसी

(यह लेख २१ अगस्त, १९७७ को नवभारत टाइम्स में प्रकाशित हो चुका है।)
‘जिन्होंने चिरपिपासाकुल संसार के संतप्त पथिकों के लिए सुशीतल सुधा-स्रोत-स्विनी पुन्य सरिता - रामभक्ति मन्दाकिनी की धवलधारा बहा दी है, जिन्होंने भक्त-भ्रमरों के अर्थ कृत-वाटिका में भाव-कुञ्ज कलिकाओं से अनुराग मकरंद प्रस्तरित किया, जिन्होंने साहित्य-सेवियों के सम्मुख भगवती भारती की प्रियतम प्रतिभा प्रत्यक्ष करा दी है, उनका भला प्राक्षःस्मरणीय नाम किस अभागे आस्तिक के हृदय-पटल पर अंकित नहीं होगा, जिसका रामचरितमानस भारतीय समाज के मन-मंदिर का इष्टदेव हो रहा है, जिनकी अभूतपूर्व रचना समस्त संसार में समादरणीय स्थान पाती जा रही है, उन रसित कविश्वर लोकललाम गोस्वामी तुलसीदास के नाम से परिचित न होना महान आश्चर्य का विषय है।' प्रस्तुत पंक्तियाँ हिंदी के महान साहित्यकार एवं आलोचक आचार्य रामचँद्र शुक्ल ने कही हैं। इन पंक्तियों के गर्भ में महाकवि तुलसीदास की महानता का समस्त अर्थ छिपा है। वास्तव में कविवर तुलसी की लेखनी ने वह कार्य कर दिखाया जो आज तक किसी कवि ने नहीं किया। वह जो कुछ रच गये वह भले ही भक्ति रस में सराबोर हो और अन्य कवियों ने अपनी कविता को विविध रसों में भिगोया हो परन्तु उसमें तुलसी की कविताकामिनी की सुषमा से श्रेष्ठ बनने की सामर्थ्य नहीं। उनकी इसी सर्वोच्चता को स्पष्ट करने के लिए डॉ. बड़थ्वाल का निम्न कथन पूर्ण समर्थ है-“मानव प्रकृति के क्षेत्र में जो उपासना है, अभिव्यंजन के क्षेत्र में वही साहित्यिक हो जाता है। गोस्वामीजी ने सूर, जायसी और कबीर की पँक्तियों को समेट कर अपनी कला के लिए न केवल भारतीय इतिहास का सर्वोत्तम कथानक ही चुना वरन उसकी लपेट के साथ ही काव्य के कमनीय कोमल कलिन कलेवर की माधुरी से सभी को मुग्ध कर दिया, परंतु साथ ही अपने वर्ण्य-विषय आध्यात्मिक-तत्त्व की प्रधानता को कभी शिथिलता नहीं दी” उन्होंने ऐसे समय में अपने उदगारों को कविता के रूप में प्रकट किया जबकि अधिकतर लोगों में निराशा की एवं अकर्मण्यता की भावना जोर पकड़ रही थी। उन्होंने अपनी सुषमामयी कविता-कामिनी के माध्यम से ऐसा मंत्र पढ़ा कि जनता सुप्त सर्प की भाँति जागकर फुंकार उठी। तुलसी का ही प्रभाव है जो हम कर्त्तव्यविमुख व्यक्तियों का अलख जगाने का ढोंग कम ही देखते हैं। उन्होंने जो कुछ लिखा वह सभी कुछ लोक -कल्याण की भावना से युक्त है। उनकी समस्त रचनाओं में लोकरंजन और लोकमंगल की भावना स्पष्ट दृष्टिगोचर होती है। उनकी लोकमंगल की भावना को ध्यान में रखकर हम किसी अन्य कवि से उनकी तुलना नहीं कर सकते हैं क्योंकि वह अपने में अनूठी है। उनका रामचरितमानस महाकाव्य जो विश्व के श्रेष्ठतम महाकाव्यों में अपना स्थान रखता है, लोककल्याण का दूसरा नाम है। उसमें तुलसी की समस्त भावनाओं का सार-संग्रह है। उन्होंने महाकाव्य में भक्तिरस के साथ ही अन्य रसों की नदियाँ भी बहायीं है, हर तरह के पात्रों का समावेश किया है, किन्तु कहीं पर भी उसके आदर्श को ठेस नहीं पहुँची है। किसी भी प्रकार के वर्णन में सत्यं-शिवं-सुन्दरं की सात्विक सुषमा ओझल नहीं होने पायी है जिसकी आभा श्री मर्यादा पुरुषोत्तम राम के गुणों एवं सौन्दर्य में प्रतिष्ठित हुई है।
मानस में तुलसी ने जिस मर्यादा को कविता-प्रेमियों के सम्मुख प्रस्तुत किया है, वह हिंदु परम्परा के दिव्य-आदर्श का उदाहरण है। हर स्थान पर श्रेष्ठता की प्रमुखता है एवं नैतिकता को सर्वत्र प्राथमिकता दी गयी है। अलौकिक-पात्रों में मानवीय रुप देखकर पाठक गदगद हो जाता है। समस्त पात्र जब अपने-अपने गुणों से युक्त होकर चराचर संसार के उभय रूपों को दर्शक के सम्मुख प्रस्तुत करते हैं तो वह नैसर्गिकता से परिपूर्ण हो जाता है, विलक्षण नहीं।
तुलसी लोकनायक कहलाए, विश्व के श्रेष्ठ कवियों में उनका नाम लिखा गया, परंतु यह जानकर आश्चर्य होगा कि उन्होंने अपने नाम से किसी मत का संचालन नहीं किया अर्थात कोई संप्रदाय नहीं चलाया, ना हीं वह इसका विरोध करके ही लोकनायक कहलाए। यदि वास्तव में देखा जाए तो वह संप्रदाय से भी बहुत ऊँचे थे। उन्होंने जो भी भाव व्यक्त किया वह सब श्रुति-सम्मत है, उन्होंने उत्तराकाण्ड में स्पष्ट किया है-
श्रुति सम्मत हरि भक्तिपथ, संजुत विरति विवेक।’
उनकी रचनाओं में नवीनता का श्रेय उनकी उचित एवं आदर्श भावनाओं को जाता है। उन्होंने हर स्थान पर आदर्श को प्राथमिकता दी है। आदर्श को ध्यान में रखते हुए उपयुक्त विषयों को स्वीकार किया और अनुपयुक्त विषयों को त्याग दिया। यही महान आश्चर्य का विषय है कि उन्होंने किसी संप्रदाय का संचालन किए बिना स्वतंत्र भावनाओं को समस्त भारतीय सँस्कृति के रोम-रोम में इस प्रकार पहुँचा दिया कि सर्वसाधारण को इसका आभास नहीं होता।
तुलसी के उदगार तो लोक-कल्याण की भावना से ओतप्रोत थे ही परंतु उनकी लोकप्रियता का श्रेय उनकी काव्य-शैली को जाता है। उनके भाव स्वतः अर्थात मूल रुप से उत्तम हैं हीं साथ ही उनको इतने कमनीय ढंग से कहा गया है कि वह तुलसीदास को लोकप्रियता के सर्वोच्च शिखर पर लाकर खड़ा कर देते हैं, उनमें हृदयवाद और बुद्धिवाद का मंजुल समन्वय है जो उनकी लोकप्रियता में और वृद्धि करता है। कवि की रचनाओं में उसके विवेकपूर्ण भावों के सुंदर दर्शन होते हैं। उन्होंने सामाजिक बह्याडम्बरों में फँसकर अपनी अपनी रचनाओं का सृजन नहीं किया बल्कि विवेक से काम लियाऔर समाज की वास्तविक स्थिति को पहचाना। भक्ति को भक्ति के लिए मानकर चले, यही उनकी भक्ति की विशेषता है जिसका पुट हमें उनकी रचनाओं में देखने को मिलता है। उन्होंने अपनी भक्ति के पीछे बाहरी साधनों की अनिवार्यता पर कभी बल नहीं दिया। नामगाथा का ही गुणगान किया-
नाम प्रसाद शंभु अविनासी, साज अमंगल मंगल राशि।
सुक सनकादि सिद्ध मुनि योगी, नाम प्रसाद ब्रह्म-सुख भोगी।
तुलसीदास ने हृदयवाद की दो विशेषताओं (अभीष्ट विषय की ओर लग्न और लग्न की विघ्नपूर्ण दशा में भी गतिशील रहना) को अनुराग वर्णन में और तीसरी विशेषता (विरोधी विषयों के त्याग के लिए पर्याप्त मनोबल) को वैराग्य वर्णन में स्पष्ट किया है। इतना ही नहीं बल्कि लोक-कल्याण की भावना का संवेदना के रुप में प्रकटीकरण जो हृदयवाद की सर्वश्रेष्ठ विशेषता है, को तुलसी की रचना में सर्वत्र देखा जा सकता है। इसके अर्थात लोककल्याण की भावना के विषय में उन्होंने कहा है-
कीरति भनति भूत बेलि सोई, सुरसरि राम सब हित होई।’
सचमुच कवि की काव्य-कला अदभुत थी, उन्होंने समाज-कल्याण को ध्यान में रखते हुए भक्ति पूर्ण कविता की। वे सच्चे अर्थों में लोकनायक थे।

Friday, July 28, 2006

हम बड़े भक्त हैं

हम बड़े भक्त हैं,
रहते सदा संत हैं,
पर जब कोई मछली आये,
मन को भाये,
तोड़ देते अपना व्रत हैं।


हम बड़े भक्त हैं,
बात के बड़े सख्त हैं,
जब कभी कोई लालच दे,
तोड़ देते अपना प्रण हैं।


हम बड़े भक्त हैं,
जोश में रखते अपना रक्त हैं,
जब कभी कोई मोर्चा बाँधे,
छोड़ देते रण हैं।


हम बड़े भक्त हैं,
जीवन में तुष्ट हैं,
जब कभी कोई राज खुले,
पाये जाते भ्रष्ट हैं।

Tuesday, July 25, 2006

काँटों भरी ज़िंदगी

अपने ग़म छिपाना कोई इनसे सीखे,
काँटों का दर्द छिपाकर मुस्कराते दिखे।

Monday, July 24, 2006

सरल हृदय


सरल हृदय
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अबला कहकर अपमान ना हो,
सबला कहकर अधिमान ना हो।

Sunday, July 23, 2006

Saturday, July 22, 2006

फोटोशॉप और मैं


गुड़्हल
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पक्के रंग बिखेरता है गुड़हल।

कनेर


कनेर
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हवा महकाते हैं

फोटोशॉप और मैं


a
Originally uploaded by pandeypremlata.
कभी-कभी यह सब लुभाता है।

Friday, July 21, 2006

संवेदना

संवेदना

चाहे प्राकृतिक आपदा आएँ या फिर दंगे-फसाद हों मरने वाले तो चले जाते हैं परंतु उनके परिजन और संबंधी गहन दुःख से घिर जाते हैं जिन्हें दुःख के साथ-साथ फिर से खड़ा होना भी पड़ता है। उनके लिए कुछ शब्द प्रस्तुत हैं:

रोने वालों हम तुम्हारे साथ हैं,
फिर से भर देंगे तुम्हारे दोनों हाथ हैं,
समय ज़रुर थोड़ा लगता है,
जीवन खोने का धक्का लगता है,
पर ऐसा कभी हुआ नहीं,
जो गिरने वाले पड़े रहे हों यूँहीं।
जीवन की कालिमा जाएगी,
फिर से प्रकाश की किरण आएगी।
जो चले गए वो तो लौट कर ना आएँगे,
पर स्वर्ग से ही तुम्हें देखकर मुस्कराएँगे,
अब हम तुम्हारे अपने हैं,
जो चले गए वो तो सपने हैं।
भूल जाना आसान नहीं होता,
पर याद करके भी तो रहना नहीं होता।
चलो उठो
आँसू पोंछ डालो,
अपनी सुध लो,
जीवन बदल डालो।
फिर से तुम्हें बसाएँगे,
जीवन तुम्हारे लहलहाएँगे।
आशा के साथ उठ जाओ,
नई स्फूर्ति और जान लगाओ।
उजाला पुनः अवश्य आएगा,
जीवन फिर से सुखी हो जाएगा।
परेशानी तो आ गयी है अपने आप,
पर दूर करना है उसे लगाकर शारीरिक ताप।
यह ठीक है कि दुःख आया है,
पर संकट की इस घडी़ में तुमने
पूरी दुनिया को अपने साथ पाया है।

Sunday, July 16, 2006

मदद! मदद! मदद!

कोई मदद करें। मैं blogger dot com वाले चिट्ठे बिल्कुल नहीं पढ़ पा रही हूँ।खुलते ही नहीं हैं, यहाँ तक कि मेरा अपना चिट्ठा भी नहीं खुलता।
कृपया कुछ समाधान कराएँ।
-प्रेमलता

Thursday, July 13, 2006

आतंकवाद

विश्व की समस्याओं की विषय-सूची में आतंकवाद प्रथम नंबर पर है। यूँ तो आस्ट्रिया के विरुद्ध सर्बों का संघर्ष भी उग्रवादी विचारधारा के रुप में ही जाना जाता है और यूरोप के (उच्चता के) घमंड ने ही १९३९ में विश्व-शांति को भंग किया था, परंतु आज जो आतंकवाद फैला हुआ है उसका और उन अशांतियों का कोई मिलान नहीं है।
आतंकवाद की जड़ें शीत-युद्ध के साथ ही जम गयीं थीं। जब बड़े-बड़े राष्ट्र अपने साथ मिलाने के लिए अन्य छोटे-छोटे देशों को हथियार पानी की तरह बहा रहे थे, हथियारों की मंडियाँ खुल रही थीं उस समय से ही आतंकवादियों को हथियार प्राप्य होने लगे थे। शीतयुद्ध के ठंडा होने के बाद ये हथियार तस्करी के रुप में इधर-उधर हो गये और आतंकवादियों के पास पहुँचते गये। पूँजीवाद के तेजी से बढ़ने, परंतु समान रुप में ना बढ़ने के कारण असमानता की खाई ज्यों की त्यों ही है। जब आतंकवादियों को धन की ज़रुरत पड़ी तो मादक पदार्थों की तस्करी करके धन कमाना शुरु कर दिया। मादक पदार्थों के व्यापार के लिए ग़रीब और कमज़ोर देशों को निशाना बनाया जाने लगा, जिस कारण से आतंकवाद को पनाह मिलती रही और कुत्सित कार्य होते रहे हैं।
भूमण्डलीकरण ने दूरियाँ बहुत पास कर दी हैं जो आतंकवादियों के लिए भी प्रभावकारी हैं। उनका जाल भी आसानी से फैल रहा है। सूचना-क्रांति का लाभ वे भी उठा रहे हैं। मादक-पदार्थों और अस्त्र-शस्त्रों की तस्करी असानी से हो रही है। वे अपने कार्यों को परिणाम तक पहुँचा रहे हैं।
सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक कमज़ोरियाँ , अशिक्षा के साथ-साथ नैतिकता का पतन अर्थात मानवीय-संवेदनाओं का धूमिल हो जाना दहशतगर्दों को फलने-फूलने का मौक़ा दे रहा है।
भ्रष्टाचार का तेजी से संपूर्ण विश्व में पनपना भी आतंकवादियों को पाल रहा है। स्वार्थ सिर्फ़ स्वार्थ, हर हाल में स्वार्थ आतंकवादियों के चारों ओर चक्रव्यूह बनने ही नहीं देता। सामाजिक विचारधाराएँ भी व्यक्तिगत चाशनी में पगी हुई सी हैं। धर्म (भगवान वाला नहीं,कर्तव्यपरायणता) अप्रचलित हो गया है तो पाप करने वाले ही बढ़ेंगे-
‘जब-जब होय धर्म की हानि,
बाढ़ैहिं असुर, अधम-अज्ञानी।’
आतंकवाद को हिलाने और मिटाने के लिए समानता की विचारधारा को ही ओढ़ना और बिछाना पड़ेगा। भौतिक सुखों में कटौती करके ज़रुरतमंदों की क्षुधा शांत करनी होगी वरना ‘भूखा कौन सा पाप नहीं कर सकता’ जैसी लोकोक्तियाँ चरितार्थ रहेंगी। बीमारी लाइलाज जैसी है जिसके ठीक होने में बहुत समय और इलाज की आवश्यकता होगी। धैर्य, सहनशीलता और एकजुटता के साथ-साथ सजगता भी रखनी पड़ेगी, तभी हम अजगर को जकड़ पाएंगे।

Wednesday, July 12, 2006

आतंक

कबूतर के अंडों को देखकर
कौआ यूँ ताकता है,
मानों यह तो उसके लिए ही
तैयार किया हुआ नाश्ता है,
फिर आता है
थोड़ा घौंसले के पास,
तेज हो जाती है
कबूतरी की साँस।
काँव-काँव करता है कौवा आसपास।
इच्छा है उसकी
अंडों को खा जाने की आज।
बस देखा ज़रा मौका
तो फोड़कर चख लिया,
सब कुछ खाकर,
अंडे का कवर फेंक दिया।
कभी-कभी तो
बच्चे भी खा जाता है,
और कबूतर बेचारा तो
देखता ही रह जाता है,
सोचता है
यह आतंकवादी है,
इसने पहनी
काली डरावनी वर्दी है।
इसे तो बस
अपने बारे में सोचना आता है,
दूसरों का जीवन
अपने लिए नष्ट करना आता है।
यही तो ढंग आतंकवादियों का है,
बना रखा खिलौना आदमियों का है।
घर, सड़क, बाज़ार
सभी जगह हैं इनके आसार।
क्या बात करें आम जगह की,
ना छोड़ी है इन्होंने विशेष सतह भी।
पर अब वो ढंग कर लिया है,
मानो गीदड़ ने शहर की ओर
मुँह कर लिया है।
अबतक छिपकर आतंक फैलाया है,
लगता है अब इनका अंत निकट आया है।

Sunday, July 09, 2006

क्रोध और सहनशीलता

क्रोध
मनुष्य का शत्रु क्रोध है,
जो जीवन की गाड़ी का अवरोध है,
उत्तेजित करता मन का क्षोभ है।
कुण्ठा में जन्म लेता है,
सारी सरसता छीन लेता है।
जब भी क्रोध आता है,
तो गर्मी फैलाता है,
सारी मोहकता ले जाता है।
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सहनशीलता
सहनशीलता एक गहना है,
जो बड़ा मँहगा है,
बहुमूल्य और दुर्लभ है,
आजकल तो बनावटी ही ज़्यादा सुलभ है।
खोज जारी है,
पर मिलना बहुत भारी है।

Saturday, July 08, 2006

आँसू और मुस्कान

आँसू एक द्रव पदार्थ होता है,
जिसका संबंध भावनाओं के चर्मोत्कर्ष से होता है।
सुख और दुःख दोनों को आँसू की चाह है,
आँसूओं के अभाव में उद्वेग में निकलती आह है।
आँसूओं के मोती ही तो जीवन सजाते हैं,
बिन इनके जीवन पूर्णतः सूखे रह जाते हैं।

...............................................

मुस्कान कठिन हो,
या मुस्कान जटिल हो,
करती एक बड़ा सवाल है,
होता उसका अलग ही जवाब है।
हँसी की अपेक्षा मुस्कान कठिन होती है,
क्योंकि मुस्कान की भाषा बहुरंगी होती है।

सुख-दुख

सुख की परिभाषा
भिन्न-भिन्न हैं,
किसी का सुख
किसी को कर देता
खिन्न है।
सबको एक सा सुख
मिलना कठिन है।
सुख की बातें ही
दे देती हैं सुख,
बिना अन्न हैं।
हर कोई चाहता है पाना,
सुख का जिन्न है।
सुख जाने की सोच कर ही,
व्यक्ति हो जाता खिन्न है।
...........................

दुःख शरीर का
कराहना देता है,
दुःख मन का
बिल्कुल तोड़ देता है।
दुःख एक ऐसा भाव होता है,
जिसके बिना सुख
कभी नहीं होता है।
दुःख का जीवन में सर्वाधिक असर होता है,
दुःख ही जीवन की अल्ट्रासाउंड-रिपोर्ट देता है।

Friday, July 07, 2006

भूख-प्यास

भूख
भूख तो सभी को लगती है,
पर सहनी सबसे ज़्यादा पेट को पड़ती है।
भूख के भी कई प्रकार हैं,
पेट के भी कई आकार हैं,
छोटे पेट वालों को तो भूखे पेट सोना पड़ता है,
बड़े पेट वालों का पेट तो सोने से ही भरता है।
.................................................................


प्यास
हर कोई है प्यासा सा,
रहता है आसरा आशा का।
प्यास पानी की है कई अर्थ में,
प्यास बुझे ना बुझे,
पानी ना उतर जाए व्यर्थ में।
पेय-द्रव से तो प्यास सब बुझाते हैं,
हम तो द्रव्य से लोटा भरना चहते हैं।

Saturday, July 01, 2006

कल्पना

कल्पना करो कल्पना की,
उसके भावों की अल्पना की,
उसकी ढृढ़ संकल्पना की,
चुनी गयी उसकी विकल्पना की।
क्या चाह थी!
क्या राह थी!
जो चुन गयी वो,
नए तानों बानों से बुन गयी जो,
उन दुर्लभ भाव-भंगिमा की,
कल्पना करो कल्पना की।
कल्पना साकार थी,
मेहनत का आकार थी,
रखती थी हृदय-सम्पदा,
डरा ना सकी उसे कोई आपदा।
विशालता की प्रतिमान थी,
सबके दिलों का अरमान थी,
सम्मान का सम्मान थी।

(आज कल्पना चावला का जन्म-दिन है)

Friday, June 30, 2006

सोच

हम( मानव) विकास की चरम सीमाओं को छू रहे हैं, सर्वत्र विज्ञान के चमत्कारों की चकाचौंध है। जीवन में भौतिक सुखों की बढ़ोत्तरी हुई है या यूँ कह सकते हैं कि जीवन जीना बहुत आसान हो गया है। वैज्ञानिक सोच बढ़ी है-तर्क, विश्लेषण और प्रतिक्रिया के गुण व्यवहार में ज़्यादा दिखायी देते हैं। सूचना-तकनीक ने तो कायाकल्प ही कर दिया है। ब्रह्मांड की दूरी पूर्णतः समाप्त करने की ठान ली है।
एक भी विषय या क्षेत्र ऎसा नहीं है जहाँ अनुसंधान ना हो रहे हों, परंतु ‘क्या हम सही दिशा में सोच रहे हैं?’ यह अनुसंधान अभी बहुत पिछड़ा हुआ है क्योंकि हम खोजों के विषय,उपकरण, प्रयोग और तत्काल अनुभवों एवं निष्कर्षों को ही अंतिम रुप मान लेते हैं। प्रभाव के बाद आने वाले परिणामों को या तो उपेक्षित रखा जाता है या फिर दुष्परिणाम निकल आने पर उस बारे में सोचा जाता है। इसके अतिरिक्त सभी विषयों का परस्पर संगठित ना होना भी एक कारण हो सकता है। उदाहरणतः चिकित्सा विज्ञान ने तो मृत्यु दर घटा दी परंतु समाजविज्ञान विसंगतियाँ ना हटा पाया और वृद्ध-समस्या का जन्म हो गया या कृषि-विज्ञान ने तो फसल पैदावार बढ़ा दी परंतु कई देशों में भुखमरी फैली हुई है। इस तरह हम बहुत आगे बढ़कर भी बहुत पीछे हैं। विज्ञान तो दुर्गम्य रास्तों पर प्रकाश फैला रहा है परन्तु चलने वाले ही ग़लत मुड़ जाएँ तो!

Wednesday, June 28, 2006

आकर्षण

मेरा तुमसे क्या संबंध है?
जिसमें ना कोई बंध है,
समय का कोई भेद नहीं,
दूरी नज़दीकी का खेद नहीं।
रात को तुम मन के दरवाज़े खोलते हो,
ना जाने क्या-क्या बोलते हो।
मैं आकर्षित हो जाती हूँ,
नयनों के रथ पर चढ़ जाती हूँ
और तुम्हारी ओर खिचती चली आती हूँ।
तुम ना जाने कहाँ चले जाते हो,
जितनी पास आऊँ उतना दूर हो जाते हो,
ना अपना आभास जताते हो।
नक्षत्र मुझे लुभाते हैं,
अपनी-अपनी ओर बुलाते हैं,
तुम्हारी हक़ीकत बताते हैं।
चँद्रमा भी मुस्कराता है,
मुझे चाँदनी से मिलवाता है,
तुम्हारी शून्यता बताता है।
बड़ी मुश्किल से विश्वास आता है,
फिर भी ध्यान तुम्हारी ओर ही जाता है,
तुम्हें खोजता रह जाता है।
ना जाने यह कैसा आकर्षण है,
अँधेरे में शून्य का निमँत्रण है,
जो खींचता अपनी ओर हर क्षण है।

Tuesday, June 27, 2006

कबूतर की कहानी

मेरे घर एक कबूतर और उसकी रानी हैं,
बिन कहे वो कहते एक कहानी हैं।
दोनों पक्के साथी हैं
जैसे दीया और बाती हैं।
प्यार करते हैं परस्पर इतना
समुद्र में जल है जितना।
रहते हैं दोनों बनकर जोड़ा,
काम करता नहीं कोई थोड़ा।
घोंसला बनाते हैं दोनों मिलकर,
अंडे रखाते हैं दोनों एक एक कर।
अपना काम कोई दिखाता नहीं,
आदमी की तरह अहसान जताता नहीं।
कबूतर भी चुग्गा लाता है,
बच्चे को भी सहलाता है।
आपस में समझबूझ है,
हमारी तरह गृहस्थी में ना खीझ है।
कभी उन्हें लड़ते देखा नहीं,
उनके जीवन में मुटाव की रेखा नहीं।
बच्चों का पालन करते हैं,
पर मोह उनका नहीं करते हैं।
कर्तव्य-भावना रखते हैं,
अनुशासन उनमें भरते हैं।
प्यार का दिखावा करते नहीं,
हमारी तरह इच्छा रखते नहीं।
आत्म-निर्भर होने पर छोड़ देते हैं,
उनको उनके जीवन से जोड़ देते हैं।
संभव हो तो सीख लो,
मोह छोड़ कर्तव्य की लीख लो।

Saturday, June 17, 2006

संक्षेप में


राह चलते चलते
पत्थर से जो टकराया,
बड़ी मुश्किल से
गिरने से बच पाया।
फिर भी पैर तो
रक्त से लथपथाया।
पर संतोष है कि
भविष्य में ठीक से
चलना तो आया।


धोखे से वार करने वालों
वार का मतलब तो जानो,
वार करने वाले वीर होते हैं,
सामने डटते हैं और धीर होते हैं।
पीछे से वार करने वाले होते हैं कायर,
वीरता तो दूर मन पूरी तरह
होते हैं घायल।


उड़ती तो पतँग भी है
पर पँछी नहीं होती।
लगती ही तो उड़ती सी है
पर डोर से बँधी होती।
घूम सकती है उतना
जितनी डोर हो साथ।
पँछी तो उड़ता है चाहे जितना
आता नहीं कभी किसी के हाथ।

(१ एवं ३ अनुभूति में प्रकाशित हो चुकी हैं।)

Wednesday, June 14, 2006

सच का नशा

हमें तो सच बोलना सिखाया,
झूठ के ख़िलाफ लड़ना बताया,
पर बात कुछ और है,
झूठ पर बहुत ग़ौर है।
सच तो कोने में पड़ा रहता है,
झूठ ही आगे बढ़-चढ़ कर रहता है।
सच अगर मुँह उठाए भी,
झूठ बैठा देगा बिन बताए ही।
सच को लोग मारना चाहते हैं,
सच्ची बातों को छोड़ना चाहते हैं।
सच्चे को हटाना चाहते हैं,
झूठे को लाना चाहते हैं।
झूठा ही झूठे की हिमायत करेगा,
सच्चा तो सच्चों के लिए मरेगा।
पर सच्चे हैं कहाँ?
झूठे ही दिखायी देते हैं यहाँ-वहाँ,
इसलिए लोग सच को झूठ कहते हैं,
अपने आप एक छ्लावे में जीते हैं।
कैसे समझाऊँ उन्हें यह बात?
सच और झूठ अलग करो एक साथ।
वरना विश्वास मर जाएगा,
श्रद्धा का गला रूँध जाएगा,
कर्म हार जाएगा,
अपराध फल जाएगा,
सबको झूठे जाल में फँसाएगा,
उजाले में अँधेरा नज़र आएगा।
इसलिए सच को अपनाओ हर काम में,
डूब जाओ सच के जाम में।
सच का नशा ग़र एक बार चढ़ जाएगा,
लाख करो जतन कभी उतर नहीं पाएगा।

Sunday, June 11, 2006

'नमन कैसे करूँ'

(अनुगूँज २०)Akshargram Anugunj


नमन कैसे करूँ?
सुमन कैसे धरूँ?
दूँ श्रद्धांजलि कैसे तुझे?
शर्म आती है मुझे।
जो देकर गये थे तुम हमें,
खुद को खोकर छोड़ गये थे हमें,
था जो बलिदान दिया तुमने,
भारत माँ को दिलाया मान तुमने,
हमने उसे समझा अपनी विरासत,
बस उसे सोचा आराम की सहायक।
कर दिया भ्रष्टता का चलन,
भर दी एक दूसरे में जलन।
हिम्मत नहीं है तुम्हारी प्रतिमा से आँख मिलाने की,
तुम पर श्रद्धा से सिर झुकाने की।
मन में तूफ़ान उठते हैं,
दोनों हाथ जुड़ने से रुकते हैं।
आत्मा ग्लानि से भर रही है,
बार-बार यह प्रश्न कर रही है-
क्या हक़ है हमें?
यूँ खिलवाड़ करने का,
केवल स्वार्थ के भाव रखने का।
आज फिर क़सम लेते हैं
देश की एकता को अपनी जान समझते हैं।
अब ना भूलेंगे तुम्हारे आदर्श,
तुम्हारे दिये गये परामर्श।
प्यार की सूखी नदी को बहाएँगे,
जीवन में ईर्ष्या मिटा समानता लाएँगे।
भेद-भाव को पतझड़ करेंगे,
देश को नयापन देंगे।

Monday, May 22, 2006

रोशनी और अंधेरा

समय के साथ चलो
नयी नयी बात करो
नयी सुबह है मिली,
चारों ओर मीठी धूप खिली।
अलसायी रात गयी,
सुनहरी प्रातः भयी,
अरे मन जल्दी करो,
नयी गागर भरो,
पर ना भूलो कल को।
होगा हर दिन नया दिन,
पर ना पूरा है कल के बिन,
आने वाले कल का भी होगा भला,
जो चलेंगे समय को साथ मिला,
रोज़ रात के बाद दिन आएगा,
जो अंधेरे की अहमियत बताएगा।
रोशनी और अंधेरा साथ साथ हैं,
जैसे इक ज़मी पर दो रात हैं।

Sunday, May 21, 2006

अनुगूँज १९ "संस्कृतियाँ दो और आदमी एक"

Akshargram Anugunj
'सब बदल गए हैं '

मापक तो वही हैं,
व्यापक भी वही हैं,
फिर क्यों संस्थापक बदल गये हैं?
उनके रीति-रिवाज़ बदल गये हैं?
बदलना था तो
बदलते कुरीतियों को
नये रिवाज़ बनाते
जोड़कर नीतियों को।
पर यह क्या कर दिया?
सारा का सारा चलन ही बदल दिया!
ना पैर ज़मीं पर है
ना सर आसमां की तरफ ,
किसी किसी बात का तो ना छोड़ा कोई हरफ।
सब यौगिक हो गये हैं,
सारे हालात बदल गये हैं
पश्चिम से रासायनिक क्रिया कर गये हैं।
किस तरह तत्व ज्ञान समझाऊं?
मूल तत्व तो रहा ही नहीं,
सब नया पदार्थ बन गये हैं।

Thursday, May 18, 2006

प्रतिकूल जीवन

(नागफनी का तर्क)
मैं कांटों की झाड़ हूं,
बिन पानी की बाढ़ हूं,
सब मुझे हैं घूरते
बुरी लगती हैं मेरी सूरतें।
सोचते हैं व्यर्थ है,
धरती पर इसका ना कोई अर्थ है।
क्या ज़रुरत थी इसे उगने की?
बिन पानी इतना बढ़ने की।
पर वो भूल जाते हैं,
ना ही उन्हें जीवन के अर्थ आते हैं,
अनुकूल स्थिति में तो सब रह जाते हैं,
जीवन में सौंदर्य समझाते हैं,
परिस्थिति बदलने पर साथ छोड़ जाते हैं।
पर मुझे तो मरुस्थल से ही प्यार है,
उसमें उगने से ही कांटों की बाढ़ है,
मैं फूल भी खिलाती हूं
और सूखे में ही हर्ष से जीवित भी रह जाती हूं।

Saturday, May 13, 2006

जननी

तुम! मां हो
मेरा पूरा जहां हो।
संसार में आए हैं तुमसे,
तुमने ही परिचय कराए हैं सबसे।
तुम्हारी पूजा करना अभिमान है,
तुम्हारी सेवा करना शान है।
बस चाहती हूं एक बात
ना बीते बिन तुम्हारे एक भी रात।
बिन तुम्हारे होंगे सारे सुख फींके,
साथ तुम्हारे हैं सारे दिन नीके।
तुम तो मेरा आधार हो,
उठाती सारा भार हो,
ना माथे पर आयी रेखा,
ना कभी कोई अवसाद देखा,
कैसे बयां करूं अपनी भावना,
हो नहीं सकती बिन तुम्हारे कोई आराधना।
जब भी होती हूँ उदास,
होता है तुम्हारे प्यार का अहसास।
नहीं होती कम कभी हिम्मत,
तुम देती हो मुझे सदा आत्मबल।
क्या क्या ना सहा तुमने हमारे लिए,
सारे कष्ट उठाए हैं ताकि हम जीएं।
तुम तो दिये का तेल हो
जो जलने से कभी रूकता नहीं,
तुम तो एक ऎसी बेल हो
जो गिरकर कभी मरती नहीं।
हमसे कभी रूठी नहीं
मुंह कभी मोड़ी नहीं,
करती हो सबकुछ अर्पण,
जीवन तुम्हारा है एक दर्पण।

Wednesday, May 10, 2006

तू बटोही क्यों रुका है

आकाश तारों से खिला है,
चंद्रमा उसमें चला है,
तू बटोही क्यों रुका है ?
अपनी राह क्यों नहीं चला है ?
रुककर खड़ा ना रह पाएगा,
तूफ़ानों में घिर जाएगा।
आँधियां उड़ा देती हैं,
रुकने वाले को ज़बरन चला देती हैं।
राह भी भूल जाएगा,
इधर-उधर भटका रह जाएगा।
चारों ओर देख ले,
मन में अपने सोच ले,
क्या कभी कोई रुका है ?
बिना चले ही टिका है ?
मंज़िल पर पहुंचना तो है,
अभीष्ट को पाना भी है,
फिर क्यों सोचता है ?
अपनी राह छोड़ता है,
चल आगे आगे चल,
अपने आप मिट जाएगा छल,
चलते-चलते ना जाने कब
निकल आएगा दिन।

Saturday, May 06, 2006

तुम तूफ़ान बनो

बड़ी तेज़ गर्मी थी
दुनिया हाहाकार करती थी।
पत्ता नहीं कोई हिलता था
हर कोई तपता था।
तभी अचानक तूफ़ान आया
साथ में बादल भी लाया।
पहले अवर्णित हवाएं चलीं
पूरी धूल उड़ा चलीं।
जो कुछ था हल्का-फुल्का
पता नहीं था उसको कहीं का।
भारी-भरकम भी ठहरे नहीं थे
ज़मीं पर टिके नहीं थे।
तभी बादल को भी जोश आया
पूरा दम बरसने में लगाया।
जो धरा तप रही थी
वो अब महक़ रही थी।
ताप शीतल हो गया
तूफ़ान शांत हो गया।
पृथ्वी मुस्कराती थी
हरी-भरी लहलहाती थी।
तुम तूफ़ान बन सकते हो
बादल की तरह बरस सकते हो।
बहुत आपाधाप है
चारों तरफ़ संताप है
तुम उसे शांत करो।
तूफ़ान बन उड़ा दो बुराई
प्रेम की बरसात से शांत हो लड़ाई।
हर तरफ़ शीतल बयार बहे
ना कहीं ईर्ष्या जलन का भाव रहे।
चारों तरफ़ सत्य-अहिंसा की हो खुशबु
सुंदर सजे मानवता की आबरू।

Thursday, April 27, 2006

प्रकाश के द्वार

भ्रम की रात काली है,
एक अंधेरी जाली है।
जब भी घूम कर देखा
दिखायी दी हर ओर काली रेखा
पर कालिमा के बीच लाली है,
वो आशा की प्याली है।
मन की आंखें खोलकर देखो,
काली जाली उखाड़कर फेंको,
परत दर परत उखड़ेगी,
तब कहीं जाकर रौशनी चमकेगी।
सारी दुनिया साफ़ नज़र आएगी,
अपनी असलियत दिखाएगी।
अगर अंधेरे में ही जीते रहे,
बिना देखे ही दुनिया समझते रहे,
तो अनर्थ बड़ा हो जाएगा,
भ्रम का जाल फैल जाएगा,
निराशा में दम घुट जाएगा।
गर अंधेरे के पार देखोगे,
प्रकाश के द्वार देखोगे,
उस द्वार को खटखटाओगे,
हीनता की संकल गिराओगे,
दरवाज़ा अपने आप खुल जाएगा,
अज्ञानता का परदा हट जाएगा,
सामने होगी दिव्य-ज्योति
जो है जीवन-धन मोती।
बस उसे ही ढ़ूढ़ना है,
अंधेरे के पार प्रकाश को खूंदना है।

Thursday, April 20, 2006

सौंदर्य

सौंदर्य वो है जो मन में सजे,
अपने आप ही सब पर फबे।
सुंदर है फूल,
चाहे कितने हों उसमें शूल।
सुंदर है गगन,
तारों के साथ है मगन।
सुंदर है दिनेश,
गर्म होकर भी है जीवेश।
सुंदर है पवन,
रखता है सबका जीवन।
सुंदर है जल,
जो जीवन का है बल।
सुंदर है धरा,
सौंदर्य जिसमें भरा।
सुंदर है रसातल,
जो छिपाए है हमारा कल।
सुंदर है मानवता,
जो सृष्टि की है छटा।
हां , सुंदरता नैसर्गिक होती है,
जो मन को झकझोर देती है।
फिर क्यों बाहरी फैशन पर ग़ौर हो गया है ?
क्या आंतरिक सौंदर्य कमज़ोर पड़ गया है ?

Wednesday, April 19, 2006

मानवता

हाय री मानवता !
तू कहां खो गयी ?
कितना ढ़ूंढ़ा तुझे ?
पर तू तो गुम हो गयी।
तुझे ढ़ूंढ़ते ढ़ूंढते
तुझ विहीन घूमते घूमते
साक्षात्कार हुआ
झूठ से,
लूट से,
भ्रष्टाचार से,
अत्याचार से,
पर तू तो खो गयी,
मानो स्वर्ग की हो गयी।
छोड़ गयी अपनी देह,
जिसमें नहीं है बिल्कुल नेह।
खोखला आकार छोड़ गयी है,
सबको स्वार्थ की ओर मोड़ गयी है।
इतनी रूठने की क्या पड़ी थी ?
तू तो संसार की जड़ी थी।
क्यों विलीन हो गयी ?
सदा के लिए खो गयी ?
हो सके तो फिर आना,
दुनिया को फिर से सजाना,
तुझ बिन गिरे हुओं को ख़ुद उठाना,
पुनः नया संसार बनाना।

Tuesday, April 18, 2006

काम कोई बुरा नहीं है

काम कोई बुरा नहीं है,
काम कोई बड़ा नहीं है,
काम किया है विवेक से,
समाज-कल्याण की भावना से,
काम किया है लगन से,
चमकाया है परिश्रम से,
तो फिर संदेह ना कर,
बस अपना काम कर।
परिणाम बुरा ना होगा,
तेरा अपमान ना होगा,
जीवन संवर जाएगा,
कष्ट के भंवर में
ना फंस पाएगा।
ना आएंगे बिरंगे भाव तुझमें,
ना सताएंगे संदेह मन में,
तू बलवान बन जाएगा,
जीवन की नाव को
किनारे तक तैराएगा।
बुरे वो हैं जो
कर्म से दूर भागें,
नहीं पता है उनको
वो कितने हैं अभागे !
ना जाने कब ?
नाव उनकी भंवर में फंस जाएगी,
हिचकोले लेगी और डूब जाएगी,
क्योंकि तैर तो वो नहीं पाएंगे,
पर अंतिम समय में
कर्म का भेद जान जाएंगे।

Monday, April 17, 2006

सौंदर्य-बोध

उनको हर चीज सुंदर लगती है,
जीवन में खुशियां हीं खुशियां भरती हैं।
नदियां नाचती नज़र आती हैं,
किनारों को छूती लहर मानों पास बुलातीं हैं।
कुंजवनों की छटाएं लुभाती हैं,
चिड़ियां चहक-चहक कर मन बहलातीं हैं।
पर्वत, दर्रे, घाटी सभी तो स्वर्ग से लगते हैं,
उनको क़दम-क़दम पर छलते हैं।
छोटी सी बरसात की बूंद भी मोती दिखायी देती है,
पृथ्वी पर फैली हरी घास भी मखमल लगती है।
व्योम भी भरा-भरा प्रतीत होता है,
तारों का जमघट बिखरे मोती सा लगता है।
पर मुझे कुछ इतना नहीं भाता है,
ठीक है हरेक पृथ्वी को सजाता है,
पर मेरे मन में इतनी गुदगुदी नहीं कर पाता है।
उनके वर्णन सुनकर मेरा मन कुछ यूं बुदबुदाता है:
मैं मन में इतनी मोहकता कैसे जगाऊं?
अपनी आत्मा को सौंदर्य से कैसे मिलवाऊं?
भूख कुछ सोचने ही नहीं देती है,
निर्धनता सारी मोहकता छीन लेती है।
जब पेट भर खाना मिला हो जीवन में,
तभी सौंदर्य दिखायी देता है हर कण में।
यहां तो लुभाता है बस दो जून खाना,
स्वर्ग बन जाता है झोंपड़ी और चिथड़े में तन सजाना।

Sunday, April 16, 2006

जीवन में रहो सदा......

कभी ओर बन कर,
कभी छोर बन कर,
जीवन में बहो
सदा किनारे बन कर।

कभी सर्द बन कर,
कभी गर्म बन कर,
जीवन में उड़ो
सदा फुहारें बन कर।

कभी फूल बन कर,
कभी शूल बन कर,
जीवन से जुड़ो
सदा बहारें बन कर।

कभी धूल बन कर,
कभी बूंद बन कर,
जीवन में रहो
सदा निस्तारे बन कर।

कभी धूप बन कर,
कभी छांव बन कर,
जीवन में खड़े हो
सदा सहारे बन कर।

कभी रात बन कर,
कभी बात बन कर,
जीवन में चलो
सदा प्यारे बन कर।

कभी सुख बन कर,
कभी दुख बन कर,
जीवन में पड़ो
सदा तुम्हारे बन कर।

Saturday, April 15, 2006

परिवर्तन

बात करने से क्या होगा?
हाथ रखने से क्या होगा?
क़ानून से ना होगा,
सज़ा देने से भी ना होगा,
परिवर्तन तो तभी होगा
जब उतार देगा समाज यह चोगा।

समाज तो हमसे बना है,
हरेक उसमें रमा है,
जब भी परिवर्तन कि बात आती है
हमारी पोलपट्टी खुल जाती है,
परिवर्तन की राह रोक दी जाती है।

इस तरह कुछ ना होगा,
समाज को तोड़ना होगा,
अच्छाई से बुराई को छांटना होगा,
सुख़-दुख़ को बांटना होगा,
कुरीतियों को छोड़ना होगा,
नीतियों को जोड़ना होगा।

परिवर्तन तो तभी होगा,
जब जन जागरण होगा,
जनजागरण तो ज्ञान के प्रकाश में होगा।

पहले इकाई होगी,
फिर दहाई मिलेगी,
धीरे-धीरे सैकड़ा होगा,
बाद में तो सहस्रों सहस्र का रेला होगा,
फिर ना कुछ सोचना होगा,
परिवर्तन तो हर हाल में होगा,
समाज का पुननिर्माण भी होगा।

Friday, April 14, 2006

आदमी

चलो आदमी को आदमी से मिलवाया जाए,
हो सके तो उसका चेहरा ही उसे दिखाया जाए।

पहचानना भूल गया है ख़ुद को आदमी,
बंद कर दी है उसने अपनी सूरत भी पहचाननी।

जब देखा था उसने ख़ुद को आईने में पहले कभी एक बार,
तो था वह एक मासूम सा भोला-भाला इंसान।

बस सोचता था अच्छाई और भलाई की बातें,
नहीं आती थीं कभी उसके जीवन में बुराई की रातें।

ईमान, धर्म, अहिंसा और प्रेम थे उसके गहने,
कपड़े भी रहता था सदा वह बेदाग़ ही पहने।

करता था प्यार हर आदमी हर आदमी से,
रहता था इंसान बनकर बड़ी सादगी से।

करता नहीं याद आदमी उस आदमी को कभी,
याद की पहचान हीं मिटा दीं हैं उसने सभी।

अपने को अपने आप से घुमा रहा है आदमी,
करता है कुछ और दिखा रहा है कुछ और आदमी।

मन के दर्पण में झांकने पर उसे जो दिखता है,
उसे देखकर अपने आप से वो बहुत डरता है।

सूरत आतंक के रंग में रंगी सी है,
ख़ून के छीटों ने उसे भद्दी सी कर रक्खी है।

डरावनी आंखें परछांई भी नहीं देख पा रहीं हैं,
असली चेहरा क्या देखेंगीं, चित्र भी पहचान नहीं पा रहीं हैं।

भूल गया है दुनियादारी पूरी तरह आदमी,
स्वार्थ की रखी है नीति बना उसने अपने आप ही॥

Wednesday, April 12, 2006

अनुगूंज १८ : धर्म का मेरे जीवन में महत्त्व

Akshargram Anugunj धर्म का मेरे जीवन में बहुत महत्त्व है। मैं समझती हूं यदि किसी के जीवन में धर्म नहीं है तो जीवन जीना असंभव सा ही है, पर मुझे नहीं लगता कि संसार में कोई भी जीव अधर्मी है।
धर्म शब्द का प्रयोग दो अर्थों में होता है- एक तो कर्त्तव्यों के लिए और दूसरा धर्मिता(आन्तरिक नैसर्गिक गुण) के लिए। इन्हीं दोनों विचारों की प्रगति और विकास के चरमोत्कर्ष की अवस्था में आज कहलाने वाले धर्म अस्तित्व में आए।
कर्त्तव्य ही धर्म है कर्त्तव्य पालन करना और कराना हमने प्रकृति से सीखा है।
प्रकृति स्वयं नियमों में बंधी है, नियम यानि अनुशासन। नियम भी पंचतत्त्वों के अनुसार भिन्न-भिन्न हैं।
धर्मिता भी नैसर्गिक है। जड़-चेतन दोनों में है जो सूक्ष्म अंतर का कारण है।
प्रकृति, जो स्वयं परिस्थितियों का परिणाम है, हमारी पहली गुरु है।उसने हमें जन्म दिया है उसी ने हमारी विचार-शक्ति को गहन बनाया है। विचारों का चर्मोत्कर्ष भावों को जन्म देता है, यही से शुरु होती है हमारी धर्मिक बहस।
किसी भी धर्म का उदभव एक समय या एक व्यक्ति या एक स्थान पर नहीं हुआ है। हजारों-हजार वर्षों तक अनुभवों की टुकड़ियों को मिलाकर धर्म वितान बने हैं। आवश्यकता आविष्कार की जननी है। व्यक्ति, समुदाय, समाज और राज्य सभी धर्म के बंधन में बंधे हैं। देश(स्थान), काल और परिस्थिति के अनुसार मांग पर विभिन्न धर्मों का अभ्युदय हुआ । जब धर्म प्रस्थापित हुए, तब उनको पूर्ण मान्यता थी क्योंकि उस समय वह माक़ूल थे, आज जैसे (स्वार्थवश मुड़े-तुड़े) नहीं। जैसे जैसे भौतिक संसाधन बढ़ते गये मानव मस्तिष्क सुखों की चाहना के इर्द-गिर्द घूमने लगा और नैतिकता (धर्म) से ध्यान हटाने लगा जिसके परिणामस्वरुप धर्म की आत्मा तो दब गयी है और बाहरी (कुरीतियां, आडम्बर, नाटकीयता और गुटबंदी) खोल ही दिखायी देने लगा है।

हरेक धर्म समाज के नैतिक पतन (परिस्थिति) के दौर में फलाफूला है। पतित विचारों के वातावरण में धर्म (नैतिक कर्त्तव्य) ही बुराइयां दूर करने में समर्थ होते हैं, परंतु इसका अर्थ यह नहीं कि सामान्य परिस्थितियों में नैतिक व्यवहार की आवश्यकता नहीं होती। यही नैतिकता का पाठ युगांतर से धर्म की गद्दी पर बैठा हुआ है और समय समय पर गद्दी संभालने वाले इसका दुरुपयोग भी करते रहे हैं। जीवन के हर बिंदु पर हमने जो बुराइयां बढ़ायीं है वही सब धर्म के परिप्रेक्ष्य में भी लागू होती हैं। यदि समाज में किसी भी बिंदु पर नकारात्मकता ना होती तो फिर धर्म का भी अस्तित्त्व ऎसा ना होता, जो एक असंभव सी बात है।
बात आज के दौर की करते हैं। आज भौतिक-विज्ञान का युग है। सर्वत्र पदार्थों और रसायनों को प्रधानता दी जा रही है। सारे सुख भौतिक रुप में ढू़ढे़ जा रहे हैं।भावनात्मक सुखों के लिए भी भौतिक साधनों की ओर ताकते हैं! यही विरोधाभास धर्म को प्रश्न बना देता है, जबकि उसमें संपूर्ण जीवन की समस्याओं के उत्तर छिपे हैं। ज़रुरत बस सूक्ष्मताओं को प्रकाशित करने की है।
इस प्रकार धर्म नियमों का पुलिंदा है जो हमें जीवन की यात्रा में आने वाली हर बीमारी से बचाता है और बीमार होने पर इलाज भी करता है। नियमों को व्यापकतम अर्थ में समझने पर धर्म का अर्थ पूर्णतः स्पष्ट हो जाता है।
मनुष्य का मस्तिष्क अत्याधिक विकसित है, वह अपनी स्पर्धा में स्वयं हार जाता है, अपने बनाए नियमों को ही ग़लत साबित करने की फिराक़ में रहता है , क्या करे प्रकृति ही ऎसी विकसित हुई है शक्ति को ही प्रमुख मानता है, सत्ता की लालसा में जीता है, फिर धर्म भी इसी सोच का शिकार हुए हैं।जब किसी भी धर्म का प्रादुर्भाव हुआ तो वह एक अनिवार्य रुप था परंतु परिवर्तन के अभाव मे( कारण चाहे अज्ञानता हो या स्वार्थ) उनका जीवन में महत्त्व ही संदेह के घेरे में घिर गया है, पालन की तो फिर बात ही दूर हो जाती है। धर्म बनाए भी मनुष्य ने हैं और विकृत भी वही करता आया है।
धर्म को पालन करने का तरीक़ा उस का क्रियारुप है। जिसमें रीति-रिवाज़ संस्कृति, कला, मोहकता, संवेदनाओं और मनोविज्ञान से जुड़े पक्ष है, जिनका महत्त्व तो कभी कम नहीं हो सकता हां अनुसंधान और विकास के अभाव में विकृति यहां भी बहुत है। समय और ज्ञानवृद्धि के साथ साथ बदलाव की आवश्यकता वहां भी है, जिसकी पूर्ति जन-जागरण से ही संभव है।
समग्र और अतिव्यापक दृष्टिकोण से देखें तो धर्म का महत्त्व लेशमात्र भी कम नहीं हुआ है, बल्कि और ज़्यादा ज़रुरी हो गया लगता है, हां धर्म को संकीर्णता और कठोरता से परे होना चाहिए। विभिन्नता में एकता के साथ सभी धर्मों में अनुसंधान होने चाहिए ताकि प्राचीन विचार संपदा का सदुपयोग हो नाकि स्वस्थ समाज अविश्वास करने लगे।
धर्म डरने या डराने के लिए नहीं बल्कि जीवन में सुख-शांति और त्याग-प्रेम अपनाने के लिए हैं बशर्ते विकार रुपी वायरस से निजात पा लिया जाए। इसप्रकार हर धर्म स्वीकारणीय और नितांत महत्त्वपूर्ण हैं। जनजागरण और अज्ञानता का समूल नाश धर्मों को नए रुप में पुनः स्थापित कर सकते हैं।
अंत में स्वरचित पंक्तियों के साथ धर्म का जीवन में आज भी पूरा महत्त्व समझती हूं।
धर्म की दीवार ना बने,
धर्म की तलवार ना चले,
ओ धर्म के ठेकेदारों!
धर्म का अधिकार ना रहे,
धर्म कर्त्तव्य ही रहे,
मानवता जिसका मंतव्य रहे।

Tuesday, April 11, 2006

चींटी तुम !

चींटी तुमने क्या दृढ़ इच्छा-शक्ति पायी है !
सारी सृष्टि की बात झुठलायी है।
ना सोती हो, ना रोती हो,
सारा जीवन कर्म का बोझ ढ़ोती हो !
क्या तुम्हें आराम करना अच्छा नहीं लगता?
या फिर काम करना ही आराम लगता है।
हम तो जल्दी थक जाते हैं,
पूरा पूरा आराम फरमाते हैं,
इस पर भी अनेक रोग लग जाते हैं,
सारा बल डाक्टर के पास जाने में लगाते हैं।
तुम कभी बीमार नहीं होतीं ?
ना कभी डाक्टर की सलाह लेतीं,
बस इधर से उधर जाती रहती हो,
सब मिलकर भगती रहती हो।
क्या यह बात मनुष्य को नहीं समझाओगी,
उसका शरीर आरामपरस्त हो गया है।
उसका सारा ध्यान सुखों की ओर हो गया है,
उसे इतना नहीं बतलाओगी ?
परिश्रम से ही ज़िंदगी संवरती,
आराम से ही परेशानी मिलती।

Monday, April 10, 2006

जीवन की नदी गहरी है

जीवन की नदी गहरी है,
जो ना कभी ठहरी है,
लहर लहर बहती है,
सुख-दुख के किनारे छूती रहती है।
जीविका की नाव चलती है,
परिश्रम से दौड़ती है।
थकते ही रुकनी शुरु हो जाती है,
लहरों के थपेड़ों से थोड़ा ही चल पाती है।
यदि चाहते हो फांट का पार पाना,
अथाह जल को तैर जाना,
तो नदी से ही तैरना सीखना पडे़गा,
उसकी लहरों की तरह किनारों से दूर जाना पडेगा।
जिंदगी का असली मज़ा भी बीच नदी में ही आता है,
किनारे पर बैठे रहने से तो मन जीते जी मर जाता है।

Sunday, April 09, 2006

धरती तुम!

रात को इतनी सुंदर क्यों लगती हो?
ऎसा लगता है पूरा श्रंगार करती हो।
अंधकार की गहरी साड़ी फबती है,
उस पर तारों जड़ी चुंनरी भी जंचती है,
चुंनरी में छापे जैसे बादलों के टुकड़े लगतेहैं,
उस पर चांदनी के रंग भी उभरते हैं,
जो और अधिक सुंदरता में वृद्धि करते हैं।
सन्नाटे में तुम्हारी छवि मुग्ध करती है,
लगता है सारी स्त्रियां
तुम्हें देखकर सजतीहैं।
छलना का रुप धर लेती हो,
सारी सृष्टि के होश छीन लेती हो।
संपूर्ण अस्तित्व शांत हो जाता है,
बस तुम्हारा व्यक्तित्व ही आभास जताता है।

Saturday, April 08, 2006

हमारी बात मान लो

बहुत हो गया अत्याचार,
फैल गया भ्रष्टाचार,
अब इसे लगाम दो,
विराम की ठान लो,
तभी क्रांति आएगी,
सारे में शांति छाएगी।
हरेक को प्रतिज्ञा करनी है,
पापों की छटनी करनी है।
धन-संपदा की चाहत में
मत फंसो पूरी तरह आफत में।
यह तो नरक का रास्ता है,
बुराइयों का नाश्ता है।
एक बार धन की इच्छा जाग्रत होने पर,
मन नहीं लगता सोने पर।
सपने में भी चालाकी सूझती है,
बार-बार बेईमानी के हल पूछती है।
आत्मा तो मर ही जाती है
बुद्धि बेकाबू हो जाती है।
बस समझ लो भ्रष्टता शुरु हो गयी,
पूरी तरह दृष्टि ख़त्म हो गयी।
कोई दिखायी नहीं देता है,
बस धन का ही ब्यौरा होता है।
शोषण का शौक़ चढ़ जाता है,
ध्रष्टता को भी मौक़ा मिल जाता है।
अपना कोई ना रह पाता है,
किसी का प्यार ना मिल पाता है।
धन कर देता है दूर सबसे,
पास रख देता है बुराई अब से।
समय रहते जान लो,
इस अर्थ को पहचान लो।
यह तो दल-दल है,
जो फंसाता हर पल है।
समाज को तोड़ देता है,
परस्पर अंतर कर देता है।
बराबर खड़े आगे पीछे हो जाते हैं,
हीनता के बीज पक जाते हैं।
कर्त्तव्य-भावना मर जाती है,
ना दूसरों की परवाह रह जाती है।
फिर पछताना पड़ता है,
जीवन कांटों में अड़ता है।
अब इसे सुधार लो,
ज़्यादा है तो दान दो।
सबको एकसा मान लो,
गिरे हुओं पर भी कुछ ध्यान दो।
उठाकर उन्हें खड़ा कर लो,
हाथ पकड़कर साथ चल दो।

Friday, April 07, 2006

सच्ची इबादत

सिर्फ मंदिर में जाकर ही पूजा नहीं होती,
सच तो यह है कि पूजा कि कोई जगह नहीं होती।
इबादत नहीं है सिर्फ मस्ज़िद में जाकर सर झुकाना,
एक और इबादत है परोपकार के काम में मन लगाना।
गुरुद्वारे में मत्था टेकने से सब कुछ होगा,
अगर गुरुओं की सीख को मन में भरा होगा।
गिरिजाघर में सच्ची प्रार्थना कैसे होगी?
अगर हमारी आत्मा जाग्रत नहीं होगी।
ना समझ बनकर समय ना गवांओ,
सबसे पहले अपने मन को समझाओ।
पृथ्वी पर ही स्वर्ग और नरक है,
इस पर ही समस्त दुर्गंध और महक़ है।
जिसे मानते हो भगवान या ख़ुदा,
वो ही तुम्हारी आत्मा में है नहीं तुमसे ज़ुदा।
सच्ची इबादत है पृथ्वी पर प्रेम बरसाना,
हिंसा और नफ़रत को जड़ से मिटाना।
करनी है सेवा तो करो नदियों की,
बनाए रखो पवित्रता उनकी सदियों की।
रक्षा हो उन वृक्ष देवताओं की,
जो रक्षा करते हैं हमारी सांसारिक वेदनाओं की।
झुकाओ सिर आराध्य सूर्य के भी आगे,
ब्रह्मांड का पिता है जो सृष्टि का आधार लागे।
पवित्र रखो पवन को भाव-भक्ति से,
कभी जीवन नहीं होगा बिन उसकी शक्ति के।
करनी है पूजा अगर भगवान की,
तो बढ़ाओ सामंजस्य और इज़्ज़त इंसान की।
सब प्राणियों में ही ख़ुदा का वास है,
जो करता है प्यार जीवों से वही उसके पास है।

Thursday, April 06, 2006

महान बनाता है शिखर

जंगलों के बीच सजे से तुम,
गगन को छूते से लगे तुम,
चंद्रमा लगा तुम्हारे पास,
तारे देते थे नज़दीकी का आभास,
तुम ऎसे अडिग खड़े,
जैसे कई दिग्गज अड़े,
बादल गोदी में खेलते हैं,
लगता है तुम्हें छेड़ते हैं,
धूप का था रंग चढ़ा,
पेड़ों ने किया तुम्हें हरा,
विशाल हृदय का रुप हो,
दॄढ़-शक्ति का स्वरुप हो,
लगता है हो अटल विश्वास,
संतोष का पूर्ण अहसास,
ऊंचाई बताती है बड़प्पन,
ढ़लान दिखाता है लड़कपन,
महान बनाता है शिखर,
देखकर होता है मन मुखर!
अपनेआप होकर ऊंचे,
करते हो मस्तक ऊंचा उनका
जो खड़े देखते हैं तुम्हें नीचे।

वंदन करते हैं हॄदय से

वंदन करते हैं हॄदय से
वंदन करते हैं हॄदय से,
याचक हैं हम  ज्ञानोदय के,
वीणापाणी शारदा मां !
कब बरसाओगी विद्या मां?
कर दो बस कल्याण हे मां।
हे करुणामयी पद्मासनी!
हे कल्याणी धवलवस्त्रणी!
हर लो अंधकार हे मां,
कब बरसाओगी विद्या मां ?
कर दो बस कल्याण हे मां।
जीवन सबका करो प्रकाशित,
वाणी भी हो जाए सुभाषित,
बहे प्रेम करुणा हॄदय में,
ना रहे अज्ञान  किसी में,
ऎसा  दो वरदान हे मां,
कर दो बस कल्याण हे मां।
ज्ञानदीप  से दीप जले,
विद्या धन का रुप रहे,
सौंदर्य ज्ञान  का बढ़ जाए,
बुद्धी ना कुत्सित हो पाए,
ऎसा देदो वरदान हे मां!
कर दो बस कल्याण हे मां!
कर दो बस कल्याण हे मां॥

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