Wednesday, June 14, 2006

सच का नशा

हमें तो सच बोलना सिखाया,
झूठ के ख़िलाफ लड़ना बताया,
पर बात कुछ और है,
झूठ पर बहुत ग़ौर है।
सच तो कोने में पड़ा रहता है,
झूठ ही आगे बढ़-चढ़ कर रहता है।
सच अगर मुँह उठाए भी,
झूठ बैठा देगा बिन बताए ही।
सच को लोग मारना चाहते हैं,
सच्ची बातों को छोड़ना चाहते हैं।
सच्चे को हटाना चाहते हैं,
झूठे को लाना चाहते हैं।
झूठा ही झूठे की हिमायत करेगा,
सच्चा तो सच्चों के लिए मरेगा।
पर सच्चे हैं कहाँ?
झूठे ही दिखायी देते हैं यहाँ-वहाँ,
इसलिए लोग सच को झूठ कहते हैं,
अपने आप एक छ्लावे में जीते हैं।
कैसे समझाऊँ उन्हें यह बात?
सच और झूठ अलग करो एक साथ।
वरना विश्वास मर जाएगा,
श्रद्धा का गला रूँध जाएगा,
कर्म हार जाएगा,
अपराध फल जाएगा,
सबको झूठे जाल में फँसाएगा,
उजाले में अँधेरा नज़र आएगा।
इसलिए सच को अपनाओ हर काम में,
डूब जाओ सच के जाम में।
सच का नशा ग़र एक बार चढ़ जाएगा,
लाख करो जतन कभी उतर नहीं पाएगा।

3 comments:

Neeraj said...
This comment has been removed by a blog administrator.
Neeraj said...

अंतरात्मा पर बोझ होता है झूठ
जाने क्यों इंसान ढोता है झूठ

परात्मा की आवाज़ है सच, मन की बात है सच.. प्रेरणादायी रचना के लिए धन्यवाद.. सच :)

Manish said...

इसलिए सच को अपनाओ हर काम में,
डूब जाओ सच के जाम में।
सच का नशा ग़र एक बार चढ़ जाएगा,
लाख करो जतन कभी उतर नहीं पाएगा।


बहुत खूब !

ट्रैफ़िक