Wednesday, May 10, 2006

तू बटोही क्यों रुका है

आकाश तारों से खिला है,
चंद्रमा उसमें चला है,
तू बटोही क्यों रुका है ?
अपनी राह क्यों नहीं चला है ?
रुककर खड़ा ना रह पाएगा,
तूफ़ानों में घिर जाएगा।
आँधियां उड़ा देती हैं,
रुकने वाले को ज़बरन चला देती हैं।
राह भी भूल जाएगा,
इधर-उधर भटका रह जाएगा।
चारों ओर देख ले,
मन में अपने सोच ले,
क्या कभी कोई रुका है ?
बिना चले ही टिका है ?
मंज़िल पर पहुंचना तो है,
अभीष्ट को पाना भी है,
फिर क्यों सोचता है ?
अपनी राह छोड़ता है,
चल आगे आगे चल,
अपने आप मिट जाएगा छल,
चलते-चलते ना जाने कब
निकल आएगा दिन।

6 comments:

Pratik said...

प्रेमलता जी, आपकी यह उत्साहवर्धक कविता बहुत अच्छी लगी।

ई-छाया said...

चलते-चलते ना जाने कब
निकल आएगा दिन।

बहुत सुन्दर प्रेरणादायक कविता है।

Udan Tashtari said...

बहुत बढिया, हमेशा की तरह एक नया स्वरुप लिये.

समीर लाल

MAN KI BAAT said...

प्रतीक,ई-शैडो और समीर भाई पंक्तियाँ अच्छी लगीं बहुत बहुत धंयवाद।
प्रेमलता पांडे

रत्ना said...

भाव सुन्दर है

रजनीश मंगला said...

अच्छी कविता है प्रेमलता जी।

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