Tuesday, August 22, 2006

दया-धर्म

दया धर्म की मूल है,
आज हो गयी फिजूल है,
दया तो दिखायी जाती है,
उसकी क़ीमत लगायी जाती है,
दया तो अपनों पर की जाती है,
दूसरों को तो दया की सीख दी जाती है।
*

धर्म एक रास्ता है,
जो सत्य-अहिंसा से साजता है,
पर आज यह बदल गया है,
इसका रुप बिगड़ गया है,
हो गया है बहुत सँकुचित,
बताता नहीं क्या है अनुचित,
कोई रास्ते की गंदगी साफ कर दो,
समभाव की टाइल्स बिछा दो।
***

2 comments:

अनूप शुक्ला said...

समभाव की टाइल्स बिछाने के लिये पुरानी जमीन तोड़नी पड़ती है।

Udan Tashtari said...

बढ़ियां है...

ट्रैफ़िक