Friday, October 23, 2009

एक नया प्रयास १६

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स घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत्।
नभश्च पृथिवीं चैव  तुमुलो व्यनुनादयन् ॥
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धरा औ’ नभ,
हो भयभीत गूंजे।
शंख-घोष! से॥
हिय-विदीर्ण,
धृतराष्ट्रसमस्त।
तीव्र-ध्वनि से॥


अब तक के श्लोकों पर दृष्टिकोण कल प्रकाशित होगा।

2 comments:

निर्मला कपिला said...

प्रेम लता जी बहुत सुन्दर धन्यवाद और शुभकामनायें ताऊ पहेली के लिये भी बधाई

अशोक बजाज said...

बहुत ही भावपूर्ण रचना . बधाई

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