कल्पना करो कल्पना की,
उसके भावों की अल्पना की,
उसकी ढृढ़ संकल्पना की,
चुनी गयी उसकी विकल्पना की।
क्या चाह थी!
क्या राह थी!
जो चुन गयी वो,
नए तानों बानों से बुन गयी जो,
उन दुर्लभ भाव-भंगिमा की,
कल्पना करो कल्पना की।
कल्पना साकार थी,
मेहनत का आकार थी,
रखती थी हृदय-सम्पदा,
डरा ना सकी उसे कोई आपदा।
विशालता की प्रतिमान थी,
सबके दिलों का अरमान थी,
सम्मान का सम्मान थी।
(आज कल्पना चावला का जन्म-दिन है)

